तारिका की फ़टी जीन्स

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युगों पुर्व प्रेमचंद के फ़टे जूते देख कर महान साहित्यकार परसाई के ज्ञान चक्षु कितने खुले थे यह तो वही जानते होंगे, पर इस रूपवती तारिका की फ़टी जीन्स देख कर मेरे ज्ञान चक्षु उसी प्रकार खुल गए जिस प्रकार धर्म परिवर्तन कर लेने से किसी दरिद्र के भाग्य खुल जाते हैं। इस तस्वीर को देखने के पुर्व मैं स्वयं को जहिलिया युग का व्यक्ति समझता था। मेरे अंदर यह हीन भावना घर बना चुकी थी कि इस अत्याधुनिक काल में एक मैं ही बेवकूफ हूँ जो फ़टी जीन्स के फायदे नही समझ पा रहा है। आखिर दुनिया की हर रूपसी जिन फ़टे वस्त्रों की ओर लालायित दृष्टि से देख रही है उनमें कुछ तो बात होगी। उनमें कुछ तो प्रगतिशीलता, कुछ तो विज्ञान, कुछ तो सद्भावना के सूत्र होंगे। आखिर जीन्स के इन बेतरतीब छेदों में छिपे जनवादिता के बीजमंत्र मुझे क्यों नही दिख रहे? क्या सचमुच मैं राजनैतिक आम आदमी हो गया हूँ? ऐसे ऐसे प्रश्नो ने मुझे विचलित कर दिया था… पर इन्ही दिनों मुझे इस रूपसी का चित्र दिखा, और उसे देखते ही मेरे मन के मैल ऐसे धूल गए जैसे पार्टी बदल देने से किसी राजनेता के पाप धूल जाते हैं। जिस प्रकार अपने ही देश की लगभग एक चौथाई जनता को गैर मराठी के नाम पर खुलेआम गाली देने और उनको मार डालने का आदेश जारी करने वाले लोग पाकिस्तान को गाली देकर पल भर में देशभक्त हो जाते हैं, ठीक उसी प्रकार इस तस्वीर को देख कर पल भर में मैं राहुल गांधी से राज ठाकरे हो गया। मैंने इस रमणी के फटेहाल जीन्स में ठीक उसी प्रकार तर्क तलाशना प्रारम्भ किया जिस प्रकार भारतीय मिडिया लाशों में टी आर पी तलाशती है। मैंने जीन्स के सबसे बड़े छेद से पूछा- तुम कवन जात हो चचा? छेद ने मुझे दुत्कारते हुए कहा- अबे हट, हम का आदमी हैं जो किसी जाति के घड़े में बधें रहेंगे? हमारी जाति बदलती रहती है। हम किसी गरीब के पैजामे में रहें तो दलित होते हैं, किसी अमीर की जीन्स में हों तो सवर्ण हो जाते हैं, और यदि किसी सुंदरी के वस्त्रों में रहें तो हमे अल्पसंख्यकों जैसा सम्मान करता है। तब हर व्यक्ति मुझे इतनी श्रद्धा से देखता है जैसे वह मन ही मन मुझे बड़े होने का आशीर्वाद दे रहा हो। मैं अगर कह दूँ तो वह ख़ुशी ख़ुशी अपनी दोनों आँखे निकाल कर मेरे अंदर डाल देगा, बल्कि वह तो यही चाहता भी है। मुझे छेद की बातें अश्लील लगने लगीं थी, मैंने बात बदली और पूछा- अच्छा छेद चचा, इतने बड़े जीन्स में तुम इतने छोटे छेद हो, तुम्हे अल्पसंख्यक होने का एहसास नही होता?छेद ने मुझे फिर चिढ़ाया- कर दी न आदमियों वाली बात, अरे पंडीजी देह में कलेजा तो अल्पसंख्यक ही होता है न। पर देह का सारा बहुसंख्यक हिस्सा मिल कर अल्पसंख्यक कलेजे की रक्षा करता है कि नहीं? तुम अपने देश में ही देखो, क्या बहुसंख्यक मिल कर अपने सारे अधिकारों को अल्पसंख्यको…… खैर छोडो, हम छेद विवादित बातें नही करते, यह काम तुम आदमियों तक ही ठीक है।मैंने छेद की बातों की ओर से ध्यान हटा कर तारिका के जीन्स का पूरी तरह अवलोकन किया। जीन्स के छेद ऊपर की तरफ छोटे होते गए हैं, जैसे कह रहे हों- आदमी जैसे जैसे ऊपर उठता जाता है वैसे वैसे उसका कलेजा छोटा होता जाता है। इस तरह ऊपर उठते आदमी का कलेजा छोटा होते होते ख़त्म हो जाता है और हर उपरवाला कलेजाहीन हो जाता है। जीन्स के छेद में छिपे रहस्य को समझ कर मैं तृप्त हो आया। मैंने छेद से अंतिम प्रश्न किया- छेद चाचा, तुम दक्षिणपंथी हो या वामपंथी? राष्ट्रवादी हो या जनवादी? नागपुरी हो या चाइनीज?छेद ने मुस्कुराते हुए कहा- यह न बताएंगे लल्ला! तुम साहित्यकार हो, बड़े दिमाग वाले हो तो यूँ ही समझ जाओ। वैसे एक बात है कि इस दुनिया में एक हम ही हैं जो दुनिया को एक करने की ताकत रखते हैं।मैं अचंभित हुआ और पूछ पड़ा- वो कैसे चचा?छेद ने कहा- भाई तुमने दुनिया को सैकड़ों देशों में बाँट दिया पर मैं सबको जोड़े बैठा हूँ। तुम ही बताओ, नेता चाहे किसी देश का हो उसके ईमान में एक बराबर छेद है कि नहीं? फिर वे अलग कैसे हुए?और देखो, तुमने दुनिया को सैकड़ों फिरकों में बाँट कर लोगों का छोटा छोटा समूह बना दिया पर मैंने सबको एक कर रखा है। सारी दुनिया के लोग वे चाहे किसी भी धर्म जाति के हों मैं सबके अंदर हूँ। वे दिन भर कमाते हैं पर मैं महंगाई का छेद बन कर उनकी सब कमाई कहाँ गिरा देता हूँ किसी को पता नही लगता। फिर सब एक जैसे लगने लगते हैं कि नहीं?मुझे लगा छेद अब मुझे पका रहा है। वैसे उसकी बातों से मुझे अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया था इसलिए मैंने उसे रंगीन सलाम ठोक कर पीछा छुड़ाया और दुबारा तस्वीर की ओर देखने लगा। मुझे याद आया प्रेमचंद की जिस तस्वीर ने परसाई के आँख खोले थे उसमे उनके जूते में छेद था। मैंने भी तारिक के जूते की तरफ आँख दौड़ाई, पर यहां नया नवेला जूता एक विशेष धंधे के लोगों के चरित्र की भांति चमक रहा था। श्वेत,धवल, निर्मल… मैं समझ गया, आधुनिकता की ओर बढ़ता और विकास करता मनुष्य जूते पर विशेष ध्यान देता है। वस्तुतः आधुनिक मनुष्य जूताप्रेमी हो चूका है। अब पहनना हो या खाना हो वह सदैव ब्रांडेड जूतों का ही प्रयोग करता है। मुझे एक बात और समझ आई कि जूते का छेद तो साहित्यकारों का आभूषण है। वह सामाजिक बुराइयों को जूता भिगो कर मारने के लिए इतनी बार जूते को भिगोता है कि उसके जूते में छेद हो जाता है। पर आधुनिक रमणी या रमण जो थोडा सा पुराना होते हीं सम्बन्धों को फेक देते हैं वे जूतों को क्यों रखेंगे। वे छेद होने के पुर्व ही नया जूता ले लेते हैं। मैंने दिमाग लगाया तो आभाष हुआ कि आधुनिक युवाओं युवतियों में ब्वायफ़्रेंड या गर्लफ्रेंड बदलने की दर और जूते बदलने की दर लगभग बराबर ही है। बस्तुतः एक रमणी के जीवन में जूता भी किसी ब्वायफ़्रेंड से कम महत्व नही रखता, या एक तरह से ब्वायफ़्रेंड भी जूता ही होता है। खैर…मैंने पुनः एक बार तस्वीर को देखा तो एक नई बात पता चली। तारिका जीन्स के जिन छेदों की ओर सबको देखने का आमंत्रण दे रही है, स्वयं उसकी ओर नही देखती, बल्कि उसकी दृष्टि दूसरी ही तरफ है। मैंने अनुभव किया जैसे इस तस्वीर के माध्यम से तारिका हमे साम्यवाद के सिद्धान्त समझा रही हो। वह बता रही है कि यदि धरती के मुद्दों को हल करना हो तो चंद्रमा की तरफ देखो। अगर गरीबी का हल निकालना हो तो गरीबों की तरफ मत देखो, बल्कि उसके लिए पूंजीवाद को गाली दो। पूंजीवाद को गाली देने से गरीबों के घर में नोट बरसने लगते हैं।अगर महिलाओं के साथ होते अत्याचारों का मुद्दा आये तो अपराधियों को दोष न दो, उसके लिए पुरुष सत्ता को दोष दो और उसे ख़त्म करने का निर्णय लो।तारिका की नजरों में छिपे भेद को समझ कर मैं दुबारा धन्य हो चूका हूँ।मैं जब भी इस तस्वीर के छः छेदों को देखता हूँ तो उन्हें श्रद्धा से प्रणाम कर लेता हूँ।सर्वेश तिवारी श्रीमुखगोपालगंज, बिहार।(पुरानी पोस्ट है। हर बार नया कहाँ से लाएं?😊)

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