लोकसभा चुनाव में इस बार कुछ नया और पहली बार

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लोकसभा चुनाव में इस बार जो नया होने जा रहा है, वह यह कि यह पहला ऐसा आम चुनाव है, जब 21वीं सदी में जन्मे लोग पहली बार मतदान करेंगे। 2014 में हुए लोकसभा के आम चुनाव के दौरान इस सदी में जन्मे लोगों की आयु 18 वर्ष नहीं थी। अब इस चुनाव में वे पहली बार देश की सरकार चुनने के लिए वोट डाल सकेंगे। 2014 से अब तक 8.4 करोड़ मतदाता बढ़े हैं। इनमें डेढ़ करोड़ मतदाता 18 से 19 साल के हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के हवाले से खबर है कि 2019 के आम चुनावों में 29 राज्यों में 18 से 22 साल तक की उम्र के वे युवा जो पहली बार मतदान करेंगे और 282 लोकसभा सीटों पर प्रत्याशियों के भाग्य विधाता बनेंगे। इन नव युवाओं की औसत से बड़ी तादाद वाले राज्य पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, झारखंड, महाराष्ट्र और राजस्थान की रूझाने नई लोकसभा की शक्ल का फैसला करेगी।

इस बार लोकसभा चुनाव में जो नया होने जा रहा है वह यह कि आपराधिक रिकार्ड वाले उम्मीदवारों को नामांकन करने के बाद अपने आपराधिक मामलों का विज्ञापन देना होगा। यह विज्ञापन व्यापक सुर्कलेशन वाले अखबारों में ही देना पड़ेगा, यानी वे छोटे अखबारों में विज्ञापन देकर बच नहीं पाएंगे। निर्वाचन आयोग के अनुसार यह निर्देश सुप्रीम कोर्ट के सितंबर 2018 के संविधान पीठ के फैसले को ध्यान में रखते हुए जारी किया है। चुनाव आयोग ने ईवीएम पर राजनीतिक दलों की आशंकाएं दूर करने के साथ सभी केंद्रों पर वीवीपेट की मांग को स्वीकार करने का बड़ा कदम उठाया है। इस पर प्रत्येक मतदान केंद्र पर वीवीपेट मशीन युक्त ईवीएम का इस्तेमाल होगा। वीवीपेट की मदद से मतदाता को उसके मतदान की पर्ची देखने को मिलती है।

आयोग के अनुसार वीवीपेट और ईवीएम से मिलान का कार्य पहले की तरह से ही होगा और एक विधानसभा सीट के मतदान बूथ पर ही यह मिलान करवाया जाएगा। मिलान की संख्या बढ़ाने का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। ईवीएम और वीवीपेट की त्रिस्तरीय जांच होगी। पहले स्तर पर राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के सामने इसकी पड़ताल की जाएगी। दूसरे स्तर पर मतदान से पहले सभी बूथ पर इनका परीक्षण होगा और कुछ वोटों का वीवीपेट से मिलान होगा। तीसरे स्तर पर मतदान के बाद प्रत्येक लोकसभा सीट की सभी विधानसभा सीटों में से एक-एक बूथ पर वोटों का वीवीपेट के जरिए मिलान कराया जाएगा। चुनाव आयोग ने ऐलान किया है कि ईवीएम और पोस्टल बैलेट पेपर पर सभी प्रत्याशियों की तस्वीरें होगी, ताकि वोटर उसकी आसानी से पहचान कर पाए। इससे चुनाव चिन्ह को लेकर पैदा होने वाला भ्रम दूर होगा।

चुनाव आयोग ने कहा कि कई बार एक जैसे नाम वाले प्रत्याशी चुनाव मैदान में होते हैं, जिस कारण वोटरों को भ्रम होता है। ईवीएम में तस्वीर को शामिल कराने के लिए सभी प्रत्याशियों को अपना नवीनतम पासपोर्ट साइज फोटो तय मानदंडों के तहत रिटर्निंग अफसर को देना होगा। चुनाव आयोग ने ईवीएम, संबंधी आशंकाओं को दूर करते हुए कहा है कि जिला मुख्यालय से ईवीएम बूथ तक पहुंचाने और उसे मतगणना केंद्र तक ले जाने के दौरान ईवीएम वाहनों की जीपीएस टे्रंकिंग होगी। यही नहीं बूथों के निर्वाचन अधिकारियों की भी ट्रेकिंग की जाएगी, ताकि पता चला सके कि चुनाव के दौरान उनकी गतिविधि कहां रही। इसके साथ ही निर्वाचन आयोग ने 17वीं लोकसभा के निर्वाचन के लिए चुनाव की तारीखों के ऐलान के तत्काल बाद देशभर में आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है। चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता का कड़ाई से पालन कराने के लिए न सिर्फ प्रतिबद्ध नजर आ रहा है, बल्कि पहली बार कई ऐसे अभूतपूर्व कदम उठाने की बात कही है, जिससे उम्मीद लगाई जा सकती है कि राजनीतिक दलों, विशेषकर प्रत्याशियों के लिए आचार संहिता का उल्लंघन करना इस बार कुछ ज्यादा ही मुश्किल होगा।

मसलन आचार संहिता तोड़ने की शिकायत मिलने के 100 मिनट के भीतर अधिकारी को प्रभावी एक्शन लेना ही होगा। आयोग ने एक मोबाइल ऐप भी लांच किया है, जिस पर कोई भी व्यक्ति आचार संहिता से जुड़ी शिकायत दर्ज करा सकेगा। आयोग ने ऐसे शिकायतकर्ताओं के नाम गुप्त रखने का वादा किया है। आयोग ने ऑनलाइन व लाइव सतत निगरानी रखने की भी बात कही है। आदर्श आचार संहिता का पालन कराने के लिए आयोग द्वारा उठाए ये कद स्वागत योग्य है, लेकिन यह देखना है कि चुनाव अभियान के दौरान राजनीतिक दल व उनके उम्मीदवार आयोग के इन प्रयासों में कितने सहभागी व सहयोगी बनते है। स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव मजूबत लोकतंत्र का आधार है। चुनाव में मतदाताओं के बीच अपनी नीतियों तथा कार्यक्रमों को रखने के लिए सभी उम्मीदवारों व दलों को समान अवसर एवं बराबरी का माहौल प्रदान किया ही जाना चाहिए, तभी चुनाव की सार्थकता है। आदर्श आचार संहिता का असल मकसद सभी दलों के लिए बराबरी का समान स्तर मुहैया कराना, प्रचार अभियान को निष्पक्ष व स्वस्थ रखना तथा दलों के बीच झगड़ों व विवादों को टालना है। इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि चुनाव में प्रतिपक्ष की तुलना में सत्ताधारी दल के साथ ज्यादा शक्ति व संसाधन होते हैं। यही वजह है कि आचार संहिता लागू करने का एक बड़ा उद्देश्य सत्तारूढ़ दल को चुनाव में अनुचित लाभ लेने से रोकना व सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग पर पाबंदी लगाना है। आचार संहिता को उम्मीदवारों के लिए आचरण और व्यवहार के मानक के रूप में स्वीकार्य किया जाना चाहिए।

यह नहीं भूलना चाहिए कि आचार संहिता को चुनाव आयोग ने जबरिया ढंग से थोपा नहीं है, बल्कि यह दस्तावेज राजनीतिक दलों की सहमति से ही अस्तित्व में आया संवर्धित हुआ है। आदर्श आचार संहिता को देश की शीर्ष अदालत से न्यायिक मान्यता मिली है, लेकिन अभी भी इस संहिता को वैधानिक दर्जा देने की मांग उठती रही है। चुनाव आयोग ऐसा दर्जा देने के कतई पक्ष में नहीं है। आयोग की सोच रही है कि आचार संहिता को कानून की पुस्तक में लाना केवल प्रतिकूल व अनुत्पादक ही होगा। आम चुनाव, चुनाव आयोग द्वारा चुनाव कार्यक्रम घोषित करने की तिथि से लगभग 45 दिन की अवधि में कराए जाते हैं। इस तरह आचार संहिता के उल्लंघन संबंधी मामलों को तेजी से निपटाने का महत्व है। यदि आचार संहिता के उल्लंघन को रोकने तथा दोषी प्रत्याशी के विरुद्ध तत्काल व सही समय से कार्रवाई नहीं की जाती है तो आदर्श आचार संहिता का महत्व ही खत्म हो जाएगा तथा आचार संहिता तोड़ने वाले आसानी से चुनाव जीतकर माननीय बन जाएंगे।

आचार संहिता को कानून में बदलने का अर्थ होगा कि कोई भी शिकायत पुलिस या मजिस्टे्रट के पास पड़ी रहेगी। न्यायिक प्रक्रिया संबंधी जटिलताओं के कारण ऐसी शिकायतों का निपटारा चुनाव पूरा होने के बाद ही संभव होगा। इसलिए यही उचित है कि आदर्श आचार संहिता को वर्तमान स्वरूप में ही यथावत रखा जाए। इस पर कानूनी मुलामा चढ़ाने के बजाए इसे आयोग के कार्य क्षेत्र तक ही सीमित रखा जाए।

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