जीएसटी घटाने से रियल एस्टेट कंपनियों के दिवालियापन का खतरा टला

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रियल एस्टेट कंपनियां जिन पर दिवालिया होने का खतरा मंडरा रहा था, जीएसटी परिषद की बैठक में निर्माणाधीन मकानों पर जीएसटी की दर 12 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी किए जाने और किफायती मकानों की परिभाषा को बदले जाने से काफी राहत मिली है। इससे अब तक रियल एस्टेट का कारोबार जो करीब-करीब ठप सा हो गया था उसे फिर से गति मिलने की संभावना बढ़ गई है। रविवार को जीएसटी परिषद की 33वीं बैठक में निर्माणाधीन मकान-फ्लेट (या निर्माणाधीन परियोजना में मकानों) पर जीएसटी दर 12 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दी है। किफायती आवास (अफोर्डेबल हाउस) की परिभाषा भी विस्तृत की गई।

अब 90 वर्गमीटर क्षेत्रफल (कॉरपेट एरिया) वाले 45 लाख रुपए तक के मकानों को किफायती मकान माना जाएगा। फिलहाल इसके लिए 50 वर्गमीटर कारपोट एरिया का पैमाना है। परिषद की बैठक में किफायती मकानों की जीएसटी की दर को भी घटाकर 8 फीसदी से महज एक फीसदी कर दिया है। परिषद की बैठक में जीएसटी कम किए जाने से निर्माण क्षेत्र को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा और मंदी की मार से जूझ रही रियल एस्टेट कंपनियों जिन पर दिवालिया होने का खतरा मंडरा रहा था। अब फिर से कारोबार में तेजी आने से उन्हें उबारने का अवसर मिलेगा। यहां यह बता दें कि अभी हाल ही कंपनी मामलों के मंत्रालय ने रियल एस्टेट कंपनियों पर दिवालिया होने की आशंका जताते हुए वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक को चिट्ठी लिखी थी।

सूत्रों के मुताबिक इस चिट्ठी में मंत्रालय की तरफ से कहा गया कि तमाम वित्तीय संस्थाओं का रियल एस्टेट सेक्टर में अच्छा खासा कर्जा है। ऐसे में इन कंपनियों द्वारा एक दिन की भी ऋण भुगतान चूक की सूचना तुरंत दी जाए। सूत्रों के मुताबिक कंपनी मामलों के मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय से एक पुख्ता रणनीति तैयार करने को कहा है ताकि इस सेक्टर को न सिर्फ कर्ज के बोझ से उबारा जा सके, बल्कि उनके दिवालिया होने का खतरा टाला जाए। वहीं रिजर्व बैंक से कहा गया है कि वह बैंकों पर नजर बनाए रखे और डिफाल्ट की सूचना तुरंत मंत्रालय पहुंचाएं। इस सेक्टर में नॉन बैंकिंग फाइनेंस कारपोरेशन और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों के एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम का निवेश है। हाल ही में हाउसिंग फाइनेंस कंपनी की तरफ से देखी गई गड़बडि़यों के बाद सरकार पहले से हरकत में आई है।

भविष्य में ऐसी कोई घटना दोबारा न हो इसके लिए पहले ही पुख्ता इंतजाम तैयार किए जा रहे हैं। कंपनी मामलों के मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि उन कंपनियों पर खास तौर पर कड़ी नजर रखने की जरूरत है, जिन पर मोटा कर्ज है। यहां यह उल्लेखनीय है कि कई रियल एस्टेट कंपनियों की सुनवाई कर्ज नहीं चुकाने को लेकर एनसीएलटी में चल रही है। जानकारों के मुताबिक रियल एस्टेट कंपनियों ने दिल्ली, एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) समेत कई मेट्रो शहरों में बड़े पैमाने पर कर्ज लेकर निवेश किया है। खरीदारों की तंगी के चलते अब उन पर दबाव बढ़ता जा रहा है। ऐसे में एक व्यवस्था बनाई जाए कि उन्हें दबाव से भी निकाला जा सके, साथ ही उनसे देश की आर्थिक हालात पर भी दबाव न पड़े। पिछले दिनों रियल एस्टेट पर दबाव वाले क्षेत्रों की जानकारी पर कंपनी मामलों के मंत्रालय ने एक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसे प्रधानमंत्री कार्यालय भी भेजा गया था।

इस रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में रियल्टी सेक्टर पर करीब 4 लाख करोड़ रुपए का कर्ज बोझ है। देशभर में इस दौरान डेवलपर्स पर कर्ज का बोझ 3.33 गुना बढ़ा है। डेवलपर्स का लाभ भी 27 फीसदी से घटकर एक दशक में 15 फीसदी ही रह गया है। देशभर में इस समय 6.73 लाख से ज्यादा बिना बिक्री यूनिट्स है। इस बारे में लियास फोट्स की रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में हजारों प्रोजेक्ट्स फंड की कमी से अटके हुए हैं।

इसके चलते उनका निर्माण बंद पड़ा है, जिससे बिक्री प्रभावित हो रही है। दिसंबर 2018 की तिमाही में सालाना आधार पर प्रोपर्टी की बिक्री में 3 फीसदी की गिरावट आई है। वहीं प्रोपर्टी की कीमतों में भी तिमाही के आधार पर एक फीसदी की कमी आई है। आगे भी स्थिति जल्द बेहतर होने की उम्मीद नहीं होने की बात कही गई। आशा की जाती है कि जीएसटी परिषद की बैठक में दर घटाने से कारोबार में फिर तेजी आएगी और रियल एस्टेट की रफ्तार बढ़ेगी।

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