प्रयागराज ही रहेगा, हाईकोर्ट ने भी लगाई योगी सरकार के फैसले पर मुहर

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प्रयागराज: यूपी की योगी सरकार द्वारा इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज किये जाने के फैसले के खिलाफ दाखिल सभी जनहित याचिकाओं को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आज खारिज कर दिया है. अदालत के इस फैसले से योगी सरकार को बड़ी राहत मिली है. अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि नाम बदलने के फैसले में सभी ज़रूरी प्रक्रियाओं का पालन किया गया है और सरकार को इस तरह का फैसला लेने का पूरा अधिकार भी है. अदालत ने फैसले में लिखा है कि देश में पहले भी मुम्बई, कोलकाता और चेन्नई समेत तमाम शहरों के नाम बदले गए हैं. इस बार भी उन्हीं नियमों का पालन किया गया है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है. हाईकोर्ट इससे पहले दिसम्बर महीने में भी एक अर्जी को खारिज कर चुका है. नई अर्जियों में भी जो दलील दी गई थी, अदालत ने उन्हें सही नहीं माना और सारी अर्जियों को खारिज कर दिया. अदालत के आज के फैसले से योगी सरकार द्वारा नाम बदलने के फैसले पर मुहर लग गई है.नाम बदले जाने के फैसले के खिलाफ कई संगठनों ने हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल की थी. मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस गोविन्द माथुर और जस्टिस चंद्रधारी सिंह की डिवीजन बेंच में हुई. अदालत ने इस मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद दिसम्बर महीने में ही अपना जजमेंट रिजर्व कर लिया था. अर्जियों में कहा गया था कि इलाहाबाद का नाम बदले जाने के मामले में नियमों की अनदेखी की गई है और यूपी सरकार को ऐसा करने का अधिकार भी नहीं है. इलाहाबाद नाम समूची दुनिया में मशहूर है और इस शहर की पहचान इसी नाम से है. गौरतलब है कि यूपी की योगी सरकार ने पिछले साल सोलह अक्टूबर को कैबिनेट से प्रस्ताव पास कराने के बाद अठारह अक्टूबर को नोटिफिकेशन जारी कर इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया था.इलाहाबाद हेरिटेज सोसाइटी समेत बारह पूर्व अफसरों- जन प्रतिनिधियों व प्रोफेसरों द्वारा दाखिल की गई पीआईएल में यूपी रेवेन्यू कोड की उस धारा 6 को चैलेंज किया गया था, जिसके तहत इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज किया गया है. अर्जी में कहा गया कि लोगों की आपत्ति के बिना ही जिला बदलने का अधिकार दिए जाने वाली रेवेन्यू कोड की यह धारा असंवैधानिक है. इसलिए इसे ख़त्म कर दिया जाना चाहिए और इसके तहत इलाहाबाद का नाम बदले जाने की प्रक्रिया को भी रद्द कर देना चाहिए. याचिकाकर्ताओं की वकील सैयद फरमान अब्बास नकवी की तरफ से कोर्ट में यह भी दलील दी गई है कि रेवेन्यू कोड की जिस धारा के तहत नाम बदला गया है, उसमे भी प्रस्ताव के बाद लोगों से आपत्ति मंगाने और उसे दूर करने के पैंतालीस दिनों के बाद ही नाम व सीमा बदलने का नियम है, लेकिन योगी सरकार ने सिर्फ कैबिनेट बैठक से ही यह फैसला ले लिया. हालांकि अदालत ने इन सभी दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया.

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