रिजर्व बैंक ने डेढ़ साल बाद की रेपो रेट में चौथाई फीसदी की कटौती

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रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने बीते सप्ताह गुरुवार को छठी द्वि-मासिक मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक में रेपो रेट में 0.25 फीसदी की कटौती कर दी। अब रेपो रेट 6.25 फीसदी है, जबकि रिवर्स रेपो रेट 6 फीसदी हो गई है। वहीं बैंक रेट 6.50 फीसदी पर आ गया है। रेपो रेट कम होने से होम, ऑटो व अन्य लोन की ईएमआई घटेगी। रिजर्व बैंक ने पिछली 3 समीक्षा बैठकों में रेपो रेट में कमी नहीं की थी। अगस्त 2017 में रेपो रेट में कमी की गई थी। अब 17 माह बाद यानी करीब डेढ़ साल के बाद रेपो रेट में कमी गई है। मौद्रिक नीति समिति के 6 सदस्यों में से 4 ने रेपो रेट कम करने के पक्ष में वोट दिया जबकि दो सदस्यों डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य और चेतन धाटे ने विरोध में वोट दिया।

जिन 4 सदस्यों ने पक्ष में वोट दिया उनमें बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास, पमी दुआ, रविन्द्र ढोलकिया और माइकल देवब्रत पात्रा शामिल है। यहां यह बता दें कि रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल के इस्तीफे के बाद उसके नए गवर्नर शक्तिकांत दास के कार्यकाल की यह पहली मौद्रिक नीति है। पूर्व वित्त सचिव दास को बीते दिसंबर में यह जिम्मेदारी दी गई तो ऐसी अटकलें लगाई गई कि आते ही वह केंद्र की मर्जी के अनुरूप ब्याज दरें कम करेंगे ताकि अर्थव्यवस्था में थोड़ी हलचल आए। रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने नीतिगत दरों में कमी कर इस बात का संकेत दिया है कि महंगाई अब काबू में है। मुश्किल का दौर खत्म हो रहा है और अर्थव्यवस्था के लिए आगे आने वाले दिन अच्छे होंगे। चुनावी साल में लोन सस्ता होना सत्तारूढ़ दल के लिए फायदेमंद होता है। लेकिन रेपो रेट घटाने को सीधे-सीधे राजनीतिक दबाव में लिया गया फैसला कहना गलत होगा। छह सदस्यों की मौद्रिक नीति समिति ने आम राय से नीति को सख्त से न्यूट्रल बनाने का फैसला लिया।

मौद्रिक नीति समिति की बैठक तीन दिन तक चली बैठक के आखिरी दिन इस बात के संकेत आने लगे थे कि इस बार महंगाई काबू रहने के कारण शीर्ष बैंक लचीला रुख अपनाएगा और नीतिगत दरों में कमी करेगा। बहस सिर्फ रेपो रेट को स्थिर रखने और इसे घटाने के बीच थी और पलड़े का दूसरी तरफ झुकना लाजमी था। शक्तिकांत दास न सिर्फ भारतीय बल्कि विश्व अर्थव्यवस्था के लक्षणों को आकलन करके ही इस नतीजे पर पहुंचे हैं। रिजर्व बैंक के इस फैसले का लंबे समय से इंतजार था। कर्ज सस्ता या महंगा होने का गणित इसी पर टिका होता है और इसका सीधा और पहला असर उन उपभोक्ताओं पर पड़ता है, जिन्होंने घर, गाड़ी और शिक्षा जैसी जरूरतों के लिए अपने बैंक से कर्ज लिया है या जो लोग इस इंतजार में रहते हैं कि कब कर्ज सस्ता हो और वे घर और गाड़ी खरीदने की योजनाएं बनाएं। रिजर्व बैंक ने वैश्विक मांग में सुस्ती के कारण जीडीपी ग्रोथ का अनुमान घटा दिया है। दिसंबर में इसने मौजूदा वित्त वर्ष में 7.4 फीसदी ग्रोथ का अनुमान लगाया था।

अब इसका अनुमान 7.2 फीसदी का है। 2019-20 की पहली छमाही क लिए भी विकास के अनुमान का 7.5 फीसदी से घटाकर 7.2-7.4 फीसदी किया गया है। पूरे 2019-20 में 7.4 फीसदी ग्रोथ का अनुमान है। यहां यह उल्लेखनीय है कि केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने भी इस वर्ष विकास दर 7.2 फीसदी रहने की बात कही है। अप्रैल-जून 2018 में विकास दर 8.2 और जुलाई-सितंबर में 7.1 फीसदी रही थी। दुनिया में कच्चे तेल की कीमत का रुझान स्थिर रहने या नीचे जाने का है। ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध से क्रूड की किल्लत पैदा होने की आशंका थी, जो अमेरिका की नरमी से खत्म हो गई है। अमेरिकी रिजर्व बैंक फेड ने अपनी दरे बढ़ाने को लेकर ठंडा रुख अपना लिया है। लिहाजा डालर भी तेजी से महंगा नहीं हो रहा। भारत समेत पूरी दुनिया मेें खाद्य वस्तुओं का सस्ता होना एक और राहत की बात है।

चीन और दुनिया की कई और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का सुस्त पड़ना एक अलग समस्या है, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था अभी इस बीमारी से बची हुई है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, भारत का वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी 7.2 फीसदी आंका है। रबी की बुवाई एक फरवरी तक पिछले साल से 4 फीसदी कम दर्ज की गई है, लेकिन माना जा रहा है कि इस बार देर तक ठंड पड़ने से पैदावार अच्छी रहेगी। अलबता ओलावृष्टि के कारण कई जगह सरसों और गेहूं की फसलों को नुकसान हुआ है। खुदरा और थोक वस्तुओं की महंगाई भी काबू में है। इन सब परिस्थितियों के मद्देनजर रिजर्व बैंक ने अपने हाथ खोलने का फैसला किया है जो ठीक ही है। रिजर्व बैंक ने किसानों को तोहफा देते हुए बिना गारंटी के मिलने वाले सीमा एक लाख रुपए थी, जिसे बढ़ाकर 1.60 लाख रुपए कर दिया है। इसी तरह बड़ी जमा राशि से जुड़े नियमों में भी बदलाव किया है। रिजर्व बैंक गवर्नर ने अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों के लिए पर्याप्त नकदी उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया है। बहरहाल, रेपो रेट कम होने से बैंक होम लोन आदि की मासिक किस्त घटाएंगे या नहीं कहना मुश्किल है, क्योंकि फंसे हुए कर्जों का दबाव उन पर अब भी काफी है।

वैसे माना यह जाता रहा है कि रिजर्व बैंक नीतिगत दरों यानी रेपो रेट के अनुरूप ही व्यावसायिक बैंक भी अपने कर्ज और सावधि जमाओं की ब्याज करें तय करते है। इसलिए अब तय माना जा रहा है कि व्यावसायिक बैंक भी कर्ज की दरें घटाएंगे। इससे कर्ज सस्ता होगा और बैंकों से कर्ज लेने वाले उपभोक्ताओं की मांग तेजी से बढ़ेगी। इसका सीधा और तात्कालिक असर वाहन बाजार और रियल एस्टेट बाजार में मंदी छाई हुई है और घर खरीदने वाले सस्त कर्ज के इंतजार में थे। अगर रियल एस्टेट और वाहन बाजार उठता है तेा इससे जुड़े अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों में भी तेजी का रास्ता ब्याज में कटौती निराश कर सकती है। रिजर्व बैंक ने महंगाई का अनुमान घटाया है। उसका कहना है कि जनवरी से मार्च 2019 के दौरान खुदरा महंगाई दर 2.8 फीसदी रहेगी। नए वित्तवर्ष 2019-20 की पहली छमाही यानी अप्रैल-सितंबर के दौरान उसने 3.2-3.4 फीसदी का अनुमान है। यहां यह बता दें कि दिसंबर-2018 में खुदरा महंगाई डेढ़ साल में सबसे कम 2.19 फीसदी पर थी। रिजर्व बैंक का कहना है कि खाद्य महंगाई डेढ़ साल में सबसे कम 2.19 फीसदी पर थी। रिजर्व बैंक का कहना है कि खाद्य महंगाई आश्चर्यजनक रूप से कम रही है।

ईंधन की महंगाई भी उम्मीद से कम रही है। रिजर्व बैंक का अनुमान है कि अब महंगाई परेशान नहीं करेगी और इस वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही जनवरी-मार्च 2019 में महंगाई दर 2.8 फीसदी रहेगी। अगर ऐसा रहा तो रिजर्व बैंक नीतिगत दरों को और नीचे ला सकता है। लेकिन बाद के महीनों में महंगाई दर बढ़ने का जोखिम बरकरार है। इसलिए मौद्रिक समिति ने साफ तौर पर कहा है कि सब्जियों और तेल की कीमत, स्वास्थ्य और शिक्षा महंगी होने, वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव और मानसून को लेकर सतर्क रहने की भी जरूरत है।

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