कैंसर का कारण और बचाव

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कैंसर जिस तेजी से दुनिया की सबसे गंभीर और जानलेवा बीमारी के रूप में सामने आया है, वह चिंताजनक है। आम धारणा तो यही है कि कैंसर का मतलब मौत होता है। लेकिन यह सही नहीं है। अगर समय पर निदान हो जाए तो इस बीमारी से निपटा जा सकता है। कैंसर के इलाज की दिशा में जो काम और शोध हो रहे हैं और इलाज की जो नई-नई तकनीक विकसित की जा रही है, उनसे काफी हद तक इसे रोक पाने में सफलता मिली है ही, कैंसर पूरी तरह आज भी लाइलाज है। तमाम देशो के वैज्ञानिक इसका इलाज खोज लेने या इसके करीब होने का दावा करते रहे हैं, लेकिन अधिकारिक घोषित तौर पर चिकित्सा विज्ञानी इसका इलाज खोज पाने में कामयाब नहीं हो पाए हैं।

समस्या यह है कि पर्याप्त इलाज और जागरूकता के अभाव में लोग कैंसर से लड़ नहीं पाते। फिर, कैंसर शब्द ही अपने आप में इतना खौफ पैदा करने वाला है कि मरीज की आधी जान तो इसका पता लगते ही निकल जाती है। इसलिए कैंसर नाम की बीमारी से निपटने के लिए दो चीजें सबसे जरूरी है, पहला पर्याप्त इलाज और दूसरी इस बीमारी के बारे में जागरूकता।

भारत में पिछले कुछ सालों में कैंसर के मरीजों की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी देखी गई है। महानगरों, शहरों, कस्बों में बढ़ता वायु-जल प्रदूषण और बदलती जीवन शैली इसके बड़े कारणों में से है। भारत के ज्यादातर शहर गंदगी और वायु प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। इन समस्याओं से निपटने की दिशा में हमारा शासन पूरी तरह विफल साबित हुआ है। अगर लोगों को साफ हवा और खाने-पीने की चीजें ही शुद्ध नहीं मिलेगी तो स्वस्थ जीवन की कल्पना कैसे की जा सकती है? वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा फेफड़ों के कैंसर के मरीज सामने आ रहे है और इनकी तादाद हर साल बढ़ रही है। लेकिन वायु प्रदूषण से निपटना सरकारों और प्रशासन की प्राथमिकता में कहीं नहीं है। मिलावटी खाद्य पदार्थ कैंसर का कारण बनते हैं, लेकिन मिलावट के कारोबार पर रोक लगाना कैंसर से लड़ने से भी ज्यादा मुश्किल है। भारत में कैंसर का एक बड़ा कारण तंबाकू भी है।

बीड़ी, सिगरेट और गुटखे का इस्तेमाल जिस तेजी से हो रहा है, यह दहलाने वाला है। बच्चों से लेकर बूढ़े तक तंबाकू का किसी न किसी रूप में धड़ल्ले से सेवन कर रहे हैं। महिलाएं भी इससे अछूती नहीं है। चौंकाने वाला तथ्य तो यह है कि मुंह के कैंसर के ज्यादातर मामले तंबाकू के सेवन से जुड़े हैं। हालांकि हर तंबाकू उत्पाद के पैकेट पर चेतावनी लिखी होती है, लेकिन जानते-बूझते लोग भी इसे छोड़ते नहीं है। सरकारें न तो इच्छुक दिखाई देती है और नहीं उतनी हिम्मत है। शहर और महानगरों की बात तो दूर, गांवों-कस्बों तक में नशे की समस्या गंभीर रूप धारण कर चुकी है।

ऐसे सवाल है कि देश की आबादी को कैंसर होने से कैसे बचाया जाए। कैंसर के मरीजों की तादाद जिस तेजी से बढ़ रही है, उसकी तुलना में इलाज की सुविधाएं एक तरह से नहीं के बराबर ही है। ज्यादातर मामलों में कैंसर का समय पर पता भी नहीं चल पाता और जब पता चलता है तब तक मरीज मौत के करीब पहुंच चुका होता है। अमीर लोग तो विदेश में इलाज करा लेते हैं, लेकिन मध्यवर्गीय या गरीब के पास न पैसा है और न सुविधाएं। कैंसर से निपटने के लिए जितना इलाज जरूरी है, उससे ज्यादा जरूरत है, उन समस्याओं से निपटने की, जो कैंसर का कारण बन रही है।

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