क्या है मायवती राज का स्मारक घोटाला, कोर्ट ने कहा था- अरबों के घोटाले का कोई भी दोषी कतई बचना नहीं चाहिए

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पूर्व की अखिलेश सरकार ने लोकायुक्त द्वारा इस मामले में सीबीआई या एसआईटी जांच कराए जाने की सिफारिश को नजरअंदाज करते हुए जांच सूबे के विजिलेंस डिपार्टमेंट को सौंप दी थी. विजिलेंस ने एक जनवरी साल 2014 को गोमती नगर थाने में नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा समेत उन्नीस नामजद व अन्य अज्ञात के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर अपनी जांच शुरू की. क्राइम नंबर 1/2014 पर दर्ज हुई एफआईआर में आईपीसी की धारा 120 B और 409 के तहत केस दर्ज कर जांच शुरू की गई. तकरीबन पौने पांच साल का वक्त बीतने के बाद भी अभी तक न तो इस मामले में चार्जशीट दाखिल हो सकी है और न ही विजिलेंस अपनी जांच पूरी कर पाई है.लोकायुक्त की रिपोर्ट में कहा गया था कि सबसे बड़ा घोटाला पत्थर ढोने और उन्हें तराशने के काम में हुआ है. जांच में कई ट्रकों के नंबर दो पहिया वाहनों के निकले थे. इसके अलावा फर्जी कंपनियों के नाम पर भी करोड़ों रूपये डकारे गए. लोकायुक्त ने 14 अरब 10 करोड़ रूपये से ज़्यादा की सरकारी रकम का दुरूपयोग पाए जाने की बात कहते हुए डिटेल्स जांच सीबीआई या एसआईटी से कराए जाने की सिफारिश की थी. सीबीआई या एसआईटी से जांच कराए जाने की सिफारिश के साथ ही बारह अन्य संस्तुतियां भी की गईं थीं. लोकायुक्त की जांच रिपोर्ट में कुल 199 लोगों को आरोपी माना गया था. इनमे मायावती सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा के साथ ही कई विधायक और तमाम विभागों के बड़े अफसर शामिल थे.भावेश पांडेय की पीआईएल में विजिलेंस द्वारा राजनीतिक दबाव में जांच को लटकाए जाने और इस मामले में लीपापोती किये जाने के आरोप लगाए गए थे. पीआईएल के जरिये लोकायुक्त की सिफारिश के तहत पूरा मामला सीबीआई को ट्रांसफर किये जाने की अपील भी की गई है. अर्जी में यह भी कहा गया है कि मामले में चूंकि तमाम हाई प्रोफ़ाइल लोग आरोपी हैं, इसलिए इसमें लीपापोती की जा रही है. याचिकाकर्ता ने सीधे तौर पर मायावती का नाम लिए बिना यह आशंका जताई है कि अगर सीबीआई या एसआईटी इस मामले में जांच करती है तो कई और चौंकाने वाले हाई प्रोफ़ाइल लोगों की मिलीभगत भी सामने आ सकती है. अदालत ने इस मामले में सख्त रवैया अपनाते हुए विजिलेंस जांच की स्टेटस रिपोर्ट एक हफ्ते में तलब कर ली और टिप्पणी की कि अरबों के घोटाले का कोई भी दोषी कतई बचना नहीं चाहिए, भले ही वह कितना भी रसूखदार क्यों न हो. क्या है स्मारक घोटाला? 1-कैग रिपोर्ट 2012 के अनुसार, चुनार (मिर्जापुर) से पत्थर लेकर उसे नक्काशी के लिए 670 किमी दूर बयाना (राजस्थान) भेजा गया. फिर 450 किमी दूर लखनऊ लाया गया. यदि चुनार में ही पत्थर काटने वालों को नियुक्त कर नक्काशी कराते तो 15.60 करोड़ परिवहन व्यय बच सकता था. रिपोर्ट में बलुआ पत्थरों के भुगतान पर भी सवाल खड़े किए गए थे. राहुल गांधी के गढ़ अमेठी के दो युवाओं को Twitter पर फॉलो कर रहे हैं पीएम मोदी 2- नवंबर 2007 में चहारदीवारी बनाने को 1890 रुपये प्रति घन फुट, ब्लाक स्थापना के लिए 1750 रुपये प्रति घन फुट और फ्लोरिंग के लिए 2400 रुपये प्रति वर्गमीटर की दर पर ठेका दिया गया. दिसंबर 2008 में संयुक्त क्रय समिति ने अपने आप कार्यो की दर घटा दी. चहारदीवारी के लिए 1300 रुपये घन फुट, ब्लाक के लिए 1750 से 1250 रुपये घन फुट व फ्लोरिंग के लिए 1750 रुपये प्रति वर्ग मीटर दर तय कर दी. यह कटौती पहले की जाती तो 22.16 करोड़ रुपये बच जाते. 3- थरमोकोल के लिए भी 25 रुपये प्रति घनफुट का भुगतान किया गया, जिसकी जरूरत ही नहीं थी. कैग ने रेडी मिक्स कंक्रीट के लिए 11.34 करोड़ अधिक खर्च करने समेत मिट्टी व बालू के आपूर्तिकर्ताओं को अधिक भुगतान, 4.51 करोड़ के सेवा कर के अधिक भुगतान पर भी सवाल उठाए गए थे. 4- खर्चों के हिसाब-किताब की मानें तो…कांशीराम-मायावती की मूर्तियों पर 6.68 करोड़, पत्थर के 60 हाथियों पर 52 करोड़, अंबेडकर परिवर्तन स्थल पर 1.20 अरब, स्क्रीन वाल पर 14 करोड़, रखरखाव पर 80 करोड़, स्मारकों के सुदृढ़ीकरण पर 2.31 अरब, 2.03 अरब म्यूजियम पर 2.72 अरब, कांशीराम स्मारक के लिए और पार्क के सौंदर्यीकरण के लिए 90 करोड़ खर्च हुए. सारे काम राजकीय निर्माण निगम ने द्वारा कराए गए. इस दौरान निगम के प्रबंध निदेशक सीपी सिंह थे. सीपी सिंह को बतौर ईनाम मायावती सरकार ने पहले दो साल फिर छह महीने का एक्सटेंशन दिया था.

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