अन्तर्मन की शांति ही सच्ची खुशी

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गये प्रभात आये रात
फिर भी बनी न बात
सुख शांति कहां मिले
बताओं मेरे प्रिय तात

आजकल का आदमी कार में है और तेज रफ्तार में है वह बहुत जल्द सब कुछ पाना चाहता है उसमें इंतजार करने का धैर्य नहीं हैं। लम्बा चलने का कठिन रास्ते तय करने के वादे इरादे नहीं हैं। वह बिना दुविधाओं के सुविधाओं को पाना चाहता है। मात्र आर्थिक सम्पन्नता उसका बड़ा लक्ष्य दिखाई देता नजर आ रहा है। लेकिन वह भूल बैठा है कि वहीं नदी सागर कहलाती है जो अनवरत बहती रहती है अनेक बाधाओं को हराती हुई, वहीं धावक वीनर बनता है जो बिना पीछे देखे लगातार पूरी क्षमता के साथ दौड़ता रहता है वहीं पर्वतारोही पर्वत को फतह कर पाता है जो लगातार अपने मन में सुख शान्ति और संकल्प रखता हैं। वहीं व्यक्ति सुख शांति का जीवन व्यतीत करता है जो अनवरत दुविधाओं को धैर्य के साथ पीछे छोड़ता रहता हैं।

विजनेस बढ़ना आसान है, कार आना आसान है, घर बनना आसान है और दौलत के अम्बार लगना भी आसान है और यहां तक कि सभी भौतिक सुविधाओं का पाना भी आसान है लेकिन अन्तर्मन की शांति को पाना कठिन ही नहीं बहुत कठिन है और यह भी सही है कि शांति तो कठिनाइयों के बीच से ही जन्म लेती है। बस मन की शांति को कोई ढूंढ़ने वाला चाहिए। सुख और दुख व्यवस्थाओं से बहुत कम सुविधाओं से बहुत कम वैचारिक तौर पर अधिक उत्पन्न होते हैं। निमितों के चलते सुख दुख के पर्याय बदलते रहते है ये निमित भी बाहर ही तलाशे जाते है लेकिन व्यक्ति को न कोई सुख दे सकता है और न दुख वह स्वयं इनके लिए जिम्मेदार होता है। अर्थात मन की गहराइयों में उतरे जहां सच्ची खुशी और सुख हिलोरे मार रहा हैं।

प्रेरणा बिन्दु:-
हौड़ दौड़ के इस जीवन को
कुछ तो आराम चाहिए
प्रसन्न रहने के लिए
मकसद भरा आयाम चाहिए।

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