राम-नाम सबसे प्रभावशाली औषध है, शक्ति है- गांधीजी

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प्रेस24 न्यूज़ – Press24 News, KNMNमहान वे हैं, जो अनुभव करते हैं कि भौतिक बल से आध्यात्मिक बल बड़ा है। गांधीजी ने इसी सत्य की साधना की और पाया कि राम-नाम में वह शक्ति है, जो तूफानों और झंझावतों में भी मुकाबला किये रहती है। 30 जनवरी, 1947, अपनी शहादत से पूरे एक वर्ष पूर्व गांधीजी ने किसी रोगी बहन को लिखे पत्र में अपनी भावनाओं श्रद्धा को व्यक्त किया था- ‘‘संसार में अगर कोई अचूक दवाई है, तो वह राम-नाम है। इस नाम को रटने वालों को जिसका अधिकार प्राप्त करने के संबंध में जिन-जिन नियमों का पालन करना चाहिए, उन सबका वे पालन करे। मगर, वह राम बाण इलाज करने की हममें योग्यता कहां है।’’ इस राम नाम में उनकी श्रद्धा आखिरी क्षण तक अचल रही।

मनु गांधी की डायरी के पन्ने में लिखे के अनुसार वो आखाजी में सद्भावना यात्रा में गांधीजी को दस्त हो जाने से कमजोरी आ गई कि बाहर से झोपड़ी में आते-आते बापू को चक्कर आ गए। बिछोना चार फुट दूरी पर ही था कि चलते-चलते ही लड़खड़ाने लगे। मैंने सावधानी से उनका सिर संभाल रखा और निर्मल बाबू को जोर से पुकारा। वे आए और हम दोनों ने मिलकर उन्हें बिछोने पर सुला दिया। फिर मैंने सोचा- कही बापू ज्यादा बीमार हो गए तो लोग मुझे मूर्ख कहेेंगे। पास के देहात में ही सुशीला बहन है, उन्हें क्यों न बुला लूं। मैंने चिट्ठी लिखी है। उन्हेें बुलाने को निर्मल बाबू के हाथ में दी ही थी कि बापू को होश आया और मुझे पुकारा। मैं पास गई तो बोले तुमने निर्मल बाबू को आवाज लगाकर बुलाया, यह मुझे बिल्कुल नहीं रूचा। तुम अभी बच्ची हो, इसलिए मैं तुम्हें माफ कर सकता हूं। परन्तु, तुमसे मेरी उम्मीद तो यही है कि तुम ओर कुछ न करके सिर्फ सच्चे दिल से राम-नाम लेती रहो। मैं अपने मन में तो राम-नाम ले ही रहा था। पर, तुम भी निर्मल बाबू को बुलाने के बजाय राम-नाम शुरू कर देती तो मुझे बहुत अच्छा लगता। अब देखो यह बात सुशीला से न कहना और न उसे चिट्ठी लिखकर बुलाना। क्योंकि, मेरा सच्चा डॉक्टर तो मेरा-‘‘राम’’ ही है। जहां तक उसे मुझसे काम लेना होगा, वहां तक मुझे जितायेगी नहीं तो उठा लेगा।

सुशीला को न बुलाना। यह सुनते ही मैं कोप उठी और मैंने तुरंत निर्मल बाबू के हाथ से चिट्ठी छीन ली। चिट्ठी फट गई। बापू ने पूछा- क्यों, तुमने चिट्ठी लिखी डाली न? मैंने लाचारी से मंजूर किया। तब, कहने लगा-‘‘आज तो तुम्हें मुझे ईश्वर ने बचा लिया यहां चिट्ठी पढक़र सुशीला अपना काम छोडक़र मेरे पास दौड़ी आती। आज मेरी कसौटी हुई। अगर, राम नाम का मंत्र मेरे दिल में पूरा-पूरा रम जावेगा, तो मैं कभी बीमार होकर नहीं मरूंगा?… फिर भी आखिरी दम तक राम-नाम का स्मरण होना चाहिए। यह भी तोते की तरह नहीं, बल्कि दिल से होना चाहिए।

राम-नाम में उनकी श्रद्धा-आस्था आखिरी क्षण तक अचल रही। 1947 की 30वीं जनवरी को यह मधुर घटना घटी और 1948 की 30वीं जनवरी को बापू ने मुझसे कहा आखिरी दम तक हमें राम-नाम रटते रहना चाहिए। इस तरह आखिरी वक्त बापू के मुंह से रा…म, रा…म सुनना मेरे भाग्य में वदा होगा? इसकी क्या कल्पना की थी? ईश्वर की गति गहन है।

नो-आखाजी में एक गांव से दूसरे गांव जाना। सुबह सात बजे ही कयाया पर होना। रास्ते में एक के बाद भजन कीर्तन और राम-धुन गाते हुए चले जाते थे। जहां जैसी जगह मिली, वे ही ठहर जाते थे। यदि कहीं जगह नहीं मिली तो जिनने झाड़ तो है ही। वहीं आराम से पड़े रहेंगे। जैसा राम जी को निभाना। हम उसकी चिंता नहीं करे। राम, सबका रखवारा है, गांधी जी का राम और राम नाम पर जैसी आस्था और निष्ठा थी, राम की उन्हें संवारता रहा। उनकी सत्य और अहिंसा मार्ग प्रशस्त करती रही। आज भी राम नाम चर्चा में है।

 कुंभ में लाखों साधु और हजारों संत राम को लेकर निर्देश आदेश देने के साथ चुनौती और चेतावनी दिए जा रहे हैं। हर चैनल पर राम की चर्चा है। राजनेता राम को लेकर नपी-नपी बातें ईजाद करने में लगे है। यह सब राम के लिए होने से अधिक राम के मंदिर को लेकर है। आध्यात्मिक बल की अपेक्षा अपनी चेतावनियों-चुनौतियों या न्यायालयों पर भरोसा है कि न्यायालय, जो विवाद जानते हैं, संवाद नहीं। गांधीजी का राम सर्व शक्तिमान है, जहां प्रेम, सत्य अहिंसा का त्रिवेणी है।

आज 30 जनवरी है, इसी दिन 1948 में ‘‘रा…म, रा….म’’ की ध्वनि के साथ महा प्रयाण कर गए।
(ये लेखक के निजी विचार है) 
प्रेस24 न्यूज़ – Press24 News, KNMN

 

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