‘दिल्ली’ …………..सर्वेश तिवारी श्रीमुख

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मशीन की भांति भागते युवाओं की भीड़, जो अपने कंधे पर परिवार भर की उम्मीदों का भारी बोझ उठा कर इतने दब गए हैं कि उनकी गर्दन झुक गयी है और उनकी आँखें मोबाइल में घुस सी गयी हैं। दिल्ली! तेरह-चौदह वर्ष के बच्चे बच्चियों की ऐसी भीड़, जिनके दिमाग में टीवी ने यह समझ भर दी है कि एक दूसरे से लिपटना ही प्रेम है। प्रेम का ‘प’ भी नहीं समझने वाले ये बच्चे यत्र-तत्र एक दूसरे से लिपट कर प्रेम में होने का नाटक कर रहे हैं। क्यों? यह वे भी नहीं जानते…दिल्ली! जहाँ पचास लाख के फ्लैट के हिस्से में बालकनी की कुल छह स्क्वायर फीट धूप आती है, और मिलती है जहर हो चुकी हवा… जहाँ आँखों में उमंग के स्थान पर सपनों की आग है, जहाँ कानों में प्रेम के दो शब्दों पर असंख्य गाड़ियों का शोर भारी है। जहाँ हृदय में सुकून नहीं, दुनिया जीत लेने की हाहाकारी चाह है।दिल्ली! जहाँ बाजार हर व्यक्ति में ‘कस्टमर’ तलाशता है। जहाँ नेता हर व्यक्ति में ‘वोट’ तलाशते हैं। जहाँ मीडिया हर चीख में ‘टीआरपी’ तलाशती है और जहाँ व्यक्ति हर सम्वेदना में रोजगार तलाशता है। डेग-डेग पर चलने वाली तलाश का नाम है दिल्ली..ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं में रहने वाले छोटे-छोटे मनुष्य, जो जी नहीं रहे केवल भाग रहे हैं। वे किससे भाग रहे हैं और क्यों भाग रहे हैं, यह वे भी नहीं जानते… लेकिन उसी दिल्ली में जब अपनी मातृभाषा के नाम पर दो-चार सौ युवा जुटते हैं और अपनी माटी की कविता पर उछल कर तालियां पीटते हैं, तो लगता है कि तमाम विसंगतियों के बाद भी दिल्ली की छाती में दिल है। और वहीं पहली बार मिल रहा कोई मित्र जब कहता है कि “मुझे कविता कहानी पसन्द नहीं आती, मैं तो आपसे मिलने आया हूँ”, तो लगता है कि दिल्ली के दिल में प्रेम जी रहा है।और उसी दिल्ली में जब ‘मुझे अपना सबसे अच्छा मित्र बताने वाले व्यक्ति’ के घर जाने पर उनका सारा परिवार मेरा इंतजार करता मिलता है, और पता चलता है कि एक दिन पहले मेरे घर के एक-एक के सदस्य के लिए “गिफ्ट” खरीदा गया है, तो लगता है कि दिल्ली वाले दिल जीतना नहीं, दिल लूटना जानते हैं। उनके घर से लौटते समय मेरे मौसेरे भाई ने कहा, “भइया! दिल्ली वाले जल्दी किसी को भाव नहीं देते, पर जिसे भाव देते हैं वह आसमान में उड़ने लगता है” सही कहा था छोकड़े ने…इतिहास का यह विद्यार्थी जानता है कि इस दिल्ली में कम से कम सौ बार निरीह मनुष्यों के कटे सरों की मीनार बना कर अरबी लुटेरों ने “गाजी” की पदवी धारण की है, पर आज मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि वे दिल्ली के हृदय को बदल नहीं सके। दिल्ली अब भी दिल्ली है, भारत का हृदय। इन ढाई दिनों में दिल्ली ने जो स्नेह दिया है उसे भूलना सम्भव नहीं। पिछले पन्द्रह वर्षों से मेरा भाई मुझे दिल्ली बुला रहा था। पर कहते हैं न, “समय से पहले और भाग्य से अधिक कुछ नहीं मिलता”, तो समय से पहले श्रीमुख बाबा दिल्ली से कैसे जाते? लेकिन गए तो ढाई दिन में दिल्ली ने अपना गुन सिखा दिया। इस ढाई दिन में ही गुरुग्राम से गाजियावाद तक का चक्कर लगा चुका हूँ। अपने जीवन में इतना कभी नहीं भागा था। फिर भी बहुत लोग छूट गए जिनसे मिलना था। समयहीनता का चरम ही है कि ससुराल भी नहीं जा पाए, आप समझ सकते हैं कि घर वापसी के बाद इस निरीह पति की क्या गति हुई होगी…धन्यवाद उनको जिन्होंने बुलाया। धन्यवाद उनको जो मेरे लिए आये। धन्यवाद उनको जिन्होंने गले लगाया। जिस जिस से पथ पर स्नेह मिला उस उस राही को धन्यवाद… और अंत मे धन्यवाद तालियों के सूखे से जूझ रहे उस मंच संचालक कवि को भी, जिन्होंने मेरे मातृभाषा प्रेम की आलोचना कर कुछ तालीयाँ बटोरीं… बधाई दीजिये श्रीमुख को, अब उसकी आलोचना भी लोगों के काम आने लगी है।यह पोस्ट उन सभी मित्रों से क्षमा याचना के लिए है जिनसे मिलने का कह कर भी न मिल सका… क्या कहें! बस क्षमा कीजियेगा।सर्वेश तिवारी श्रीमुखगोपालगंज, बिहार।

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