सपा-बसपा के वोट किस सीमा तक एक-दूसरे के साथ जाएंगे और इसका कौन कितना फायदा पाएगा?

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चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन को एक -दूसरे के लिए वोट ट्रांसफर कराना किसी चुनौती से कम नहीं होगा। गठबंधन की मुख्य सफलता इसी कसौटी पर निर्भर करेगी कि सपा-बसपा के वोट किस सीमा तक एक-दूसरे के साथ जाएंगे और इसका कौन कितना फायदा पाएगा? पूर्व में बसपा ने जब-जब गठबंधन किया है, सहयोगी दलों की अपेक्षा वह ज्यादा फायदे में रही है। बसपा इसके पहले दो बार चुनाव पूर्व गठबंधन कर चुकी है। 1993 में सपा और 1996 में कांग्रेस के साथ गठबंधन हुआ। दोनों ही बार फायदा बसपा को हुआ। 1991 में 9.44 प्रतिशत वोट शेयर वाली बसपा ने 1993 में सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। नतीजा यह रहा कि 12 विधायक वाली बसपा के 67 विधायक हो गए और वोट शेयर बढ़कर 11.12 प्रतिशत पहुंच गया। पहले से ही प्रभावशाली भूमिका वाले मुलायम की नवगठित सपा को 17.94 प्रतिशत वोट मिले थे। 1995 में गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा से गठबंधन टूटा तो बसपा ने 1996 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से हाथ मिला लिया। इसका नतीजा ये रहा कि 1991 में 46 सीटें और 17.32 प्रतिशत वोट शेयर तथा 1993 में 28 सीटें और 15.08 प्रतिशत वोट शेयर वाली कांग्रेस औंधे मुंह गिर गई। बसपा ने कांग्रेस का वोट शेयर अपनी तरफ खींच लिया 1996 में बसपा की सीटें तो 1993 के बराबर 67 ही रहीं लेकिन उसने कांग्रेस का बेस वोट शेयर अपनी ओर खींच लिया। बसपा को कांग्रेस से गठबंधन में 19.64 फीसदी वोट मिला था और कांग्रेस वोट हिस्सेदारी में 8.35 प्रतिशत पर सिमट गई थी। बसपा का थोड़ा कम-ज्यादा यह बेस अभी तक बरकरार है। पिछले लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न पाने के बावजूद बसपा का वोट शेयर 19.60 प्रतिशत था और 2017 के विधानसभा चुनाव में मात्र 19 सीटें जीतने के बावजूद उसे 22.20 प्रतिशत वोट मिले थे। …तो अन्य विकल्पों को तवज्जो देते हैं बसपा समर्थक आंकड़े गवाह हैं कि बसपा समर्थक मतदाता सपा या कांग्रेस के विकल्प में आने पर अपने को उनके साथ सहज महसूस नहीं करता है। जब भी गठबंधन हुआ है, उसने अन्य विकल्पों को तवज्जो दी। 1991 में 221 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आने वाली भाजपा, 1993 में सपा-बसपा के बीच गठबंधन के बाद सत्ता से तो बाहर हो गई लेकिन उसका बेस वोट बढ़कर 33.30 प्रतिशत पहुंच गया। इसी तरह 1996 में बसपा-कांग्रेस से गठबंधन के दौरान उसे 32.52 फीसदी वोट मिले थे। ये मजबूरियां भी चर्चा में – पिछले पांच साल में सपा और बसपा दोनों ही लोकसभा और विधानसभा के चुनाव हारकर न सिर्फ सांगठनिक रूप से कमजोर हुई हैं बल्कि आर्थिक रूप से भी कमजोर हुई हैं। – विधानसभा चुनाव के बाद से दोनों ही दल गठबंधन की दिशा में बढ़ने लगे थे। लिहाजा आंतरिक रूप से अनावश्यक खर्च को सीमित कर चुनिंदा क्षेत्रों तक फोकस रखा गया। – दोनों दलों को पता है कि लोकसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत न होने पर वे ‘किंग मेकर’ तो हो सकते हैं लेकिन ‘किंग’ की भूमिका में आना आसान नहीं है। इसलिए इस चुनाव में न्यूनतम संसाधन और अधिकतम उपलब्धि प्राप्त करने की रणनीति। – दोनों ही दलों की नजर मुख्य रूप से विधानसभा चुनाव पर रहती है। ये अपने अधिकतम संसाधन को तब तक बचाए रखना चाहते हैं।

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