योग्यता का सम्मान कोई योग्य ही कर सकता है

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पुरानेसमय में एक गुरूजी के पास बहुत सारे शिष्य विद्याध्यन करते थे। गुरूजी अपने शिष्यों को रोज एक अच्छी बाते कहते थे। शिष्य भी अपने गुरूजी से रोज अच्छी बात सुनकर अपने जीवन में उसे ग्रहण करते थे। एक दिन गुरूजी ने एक शिष्य को अपने पास बुलाया और उसे एक चिकना पत्थर दिया और कहा इसे ले जाओं और सब्जी वाले से पूछकर आओ कि इसके बदले में वह इसकी क्या कीमत देगा।

वह शिष्य उस चिकने पत्थर को लेकर दिनभर इधर से उधर सब्जी वालों के यहां फिरता रहा, लेकिन किसी ने भी उसे दो चार रुपयों से अधिक नहीं बताये। क्योंकि सब्जी वालों ने सोचा कि यह पत्थर केवल बट्टे का ही काम कर सकता है इसलिए इसकी कीमत अधिक से अधिक दो चार रुपये ही हो सकती है। शिष्य ने अपने गुरूजी को ये सारी बातें बताई।

गुरूजी ने शिष्य से कहा कि कोई बात नहीं है अब तुम इस चिकने पत्थर को लेकर सुनारों के पास जाओं और उनसे पूछो कि वे इसकी क्या कीमत दे देंगे। यह शिष्य खुशी-खुशी से सुनारों के मोहल्ले में गया और एक एक दुकान पर जाकर उस पत्थर की कीमत पूछने लगा। लगभग सभी सुनारों ने उसकी कीमत हजार रुपयों के आस पास बताई। शिष्य वापस अपने गुरूजी के पास आया और कीमत के बारे में बतलाया। गुरूजी ने शिष्य से फिर कहा कि कोई बात नहीं है। अब गुरूजी ने शिष्य को जौहरियों के बाजार में भेजा। शिष्य वहां गया और उस चिकने पत्थर की कीमत लाखों में पहुंच गई शिष्य ने यह बात अपने गुरूजी से बतलाई।

व्यक्ति की योग्यताओं, क्षमताओं और इंसानियत की कीमत कोई योग्य इंसान ही समझ सकता है क्योंकि ज्ञानवानों में ही दुनिया बदली है। योग्यता व्यक्ति का बहुत महत्वपूर्ण आभूषण है और इस आभूषण की प्रशंष कोई योग्य जन ही कर सकता है। ऐसे में किसी अयोग्य के सामने जाकर अपनी योग्यता का बखान करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि अपनी योग्यता में निरन्तर अभिवृद्धि करते रहने की आवश्यकता हैं।

प्रेरणा बिन्दु:-
इंसानियत अपने आप में सम्मनित है इसे किसी से सम्मान लेने की जरूरत नहीं हुआ करती है।

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