भाजपा के तरकश में और कई तीर

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आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला कर केंद्र सरकार ने भाजपा का चुनावी मुद्दा तैयार कर दिया है। इससे भाजपा लोकसभा चुनावों से पहले अपने समर्थक वर्ग की नाराजगी को दूर कर सकेगी। साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामाजिक समरसता के एजेंडे को भी धार देगी। चुनाव से ठीक पहले अगड़ों के लिए आरक्षण का ऐलान यह बताता है कि भाजपा पिछले तीन विधानसभा चुनाव में हार का सबसे बड़ा कारण सवर्णों का गुस्सा मानती है।

सवर्णों को इससे कितना फायदा होगा यह तो बाद की बात है, पर सरकार के इस कदम से सवर्ण वोटर चर्चा में जरूरत आ गया है। तभी गरीब अगड़ों को आरक्षण का ऐलान होते ही कांग्रेस समेत ज्यादातर क्षेत्रीय दलों ने इसका स्वागत करने में देर नहीं लगाई। भाजपा का कदम एससी, एसटी पर कानून में संशोधन से उपजी सामान्य वर्ग की नाराजगी दूर करने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग दशकों पुरानी है। लेकिन केंद्रीय स्तर पर किसी भी सरकार ने अब तक पहले से जारी आरक्षण को छोड़े बिना विचार नहीं किया। इसे मोदी सरकार का एक साहसिक फैसला माना जा सकता है क्योंकि एससी/एसटी और ओबीसी कोटे से इतर अन्य गरीबों के लिए आरक्षण का इंतजाम करना कोई मामूली कदम नहीं है।

कांग्रेस ने इसके समर्थन की बात कहकर पहले ही अपनी स्थिति साफ कर दी थी। सरकार का सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने का फैसला एक तीर से कई निशाने के रूप में माना जा रहा है। यह फैसला सवर्णों की नाराजगी दूर करता है तो गरीबी के खिलाफ उठाया गया कदम भी है। फैसले के दायरे में उच्च जातियों की करीब 65-70 फीसदी आबादी आएगी। माना जा रहा है कि इससे चुनावी फायदा भी होगा। इसके लिए सरकार को यह भी ध्यान रखना होगा कि विपक्ष यह संदेश नहीं देने पाए कि यह सरकार उच्च जातियों की पैरवीकार है। आज नहीं तो कल निचले तबके के आरक्षण पर हमला किया जा सकता है। सवर्णों को आरक्षण के फैसले को सरकार को गेमचेंजर मान रही है। सरकार से जुड़े उच्च पदस्थ सूत्रों का मानना है कि तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में जहां पार्टी की हार हुई, उसमें सवर्णों की नाराजगी भी एक बड़ा कारण रही है।

दरअसल चुनाव से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी/एसटी के बाबत दिए गए फैसले को बदलने के लिए सरकार ने कानून बनाया था। सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट के तहत अनिवार्य गिरफ्तारी को खत्म कर दिया था। लेकिन सरकार ने कानून बनाकर फिर से इसे अनिवार्य कर दिया। माना जा रहा है कि इस फैसले ने सवर्ण को नाराज कर दिया था। राज्यसभा में बुधवार को देर रात तक चली इस बहस में सत्तारूढ़ दल ने इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मास्टर स्ट्रोक कहा तो कुछ ने इसे मोदी का छक्का कहा। विपक्ष के एक सदस्य ने कहा कि छक्के ने बाउंडरी पार नहीं की। इस पर कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि अभी तो कई और छक्के लगेंगे। कानून मंत्री प्रसाद ने इस कथन से इस बात के संकेत मिलते हैं कि केंद्र की भाजपा सरकार चुनावों की घोषणा के ठीक पहले कई और फैसले लेने वाली है। लगता है कि भाजपा के तरकश में अभी और कई तीर है।

संकेत मिले हैं कि चुनावों की घोषणा के ठीक पहले सरकार राम मंदिर मुद्दे पर भी बड़ा फैसला कर सकती है। सूत्रों के अनुसार चुनावों के लिए भाजपा ने पांच क्षेत्रों में बड़े फैसलों की तैयारी की है। इसमें आर्थिक आधार पर आरक्षण पहला बड़ा फैसला है। इससे उसने युवा व रोजगार के सवालों को भी कम किया है। अगला कदम किसानों को बड़ी राहत देने की है, जिसमें किसानों के खाते में सीधे राशि पहुंच सकती है। तीसरा बड़ा मुद्दा राम मंदिर का होगा। इसके अलावा आतंरिक सुरक्षा (आतंक) के खिलाफ बड़ी कार्रवाई के संकेत है। पांचवां मुद्दा आयकर में राहत देने का है। बीते माह तीन राज्यों के विधान चुनाव में हार के बाद भाजपा और संघ नेतृत्व के बीच मंथन में दो बातें साफ तौर पर उभरी थी। पहला यह कि एससी/एसटी एक्ट के बाद उसका अपना समर्थक वर्ग नाराज है।

दूसरा संघ के स्वयंसेवक भी सक्रिय नहीं है। ऐसे में लोकसभा चुनाव में भी नुकसान हो सकता है। भाजपा का जोर उत्तर भारत में विपक्ष के संभावित राज्यवार गठबंधनों व कांग्रेस की सत्ता वाले राज्यों में अपने पिछले (2014 के) प्रदर्शन को दोहराने की है। पार्टी का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चेहरा उसका सबसे बड़ा कार्ड है। ऐसे में उसके इस तरह के बड़े फैसले विपक्ष के सारे प्रयासों पर भारी पड़ेंगे। किसानों के लिए और कई घोषणाएं होने वाली है।

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