सुरक्षित सफर के लिए सडक़ हादसों पर रोक के उपाय

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देश में सडक़ हादसों एवं मृतकों की संख्या पर अंकुश लगाने के लिए सरकार राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत रोड एक्सीडेंट डाटा बेस यानी आईआरएडी तैयार करने जा रही है। इससे सभी राज्यों के हादसों से जुड़े आंकड़े एक प्लेटफार्म पर होंगे। सडक़ हादसों की वैज्ञानिक जांच कर ठोस उपाय लागू किए जा सकेंगे। सडक़ परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय आईआरएडी बनाने के लिए राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के परिवहन विशेषज्ञों की मदद लेगा। इसके तहत बीते 26 दिसंबर को प्री-बिड बैठक हो चुकी है।

योजना के मुताबिक विश्व बैंक से वित्तीय सहायता से अगले 9 माह में आईआरएडी बनकर तैयार हो जाएगी। जिससे राज्य स्तर पर ;सडक़ सुरक्षा प्रबंधन विकसित किया जा सकें। इसके लिए सबसे पहले सभी राज्यों के सडक़ हादसों से संबंधी आंकड़े एकीकृत रूप से एक प्लेटफार्म पर ऑनलाइन होने चाहिए। सडक़ हादसों की वैज्ञानिक जांच करने के बाद ही उनको रोकने क ठोस उपाय लागू हो सकेंगे। सडक़ परिवहन विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद सालों से सडक़ हादसों व मृतकों की संख्या में कमी नहीं आई है। हर साल औसतन में कमी नहीं आई है। हर साल औसतन 5 लाख सडक़ हादसे होते है। इसमें डेढ़ लाख लोगों की असमय मौत हो जाती है, जबकि 3 लाख आंशिक अथवा पूर्णरूप से विकलांग हो जाते हैं। सडक़ हादसों के लिए वाहनों की ओवर स्पीड, ओवर लोडिंग, शराब पीकर गाड़ी चलाना और हाईवे इंजीनियरिंग में त्रुटि प्रमुख कारण माने जाते हैं।

एकीकृत रोड एक्सीडेंट डाटाबेस सडक़ हादसों को कम करने में सहायक सिद्ध होगा। मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार राज्य सरकार रोड एक्सीडेंट डाटा मैनेजमेंट सिस्टम विकसित करेगी। राज्य पुलिस प्रशासन व्यापक रूप से हादसों के बारे ेमें जानकारियां, कहां हुआ, कैसे, कब वाहन स्थिति, ओवर स्पीड, ओवर लोडिंग, ड्राइविंग लाइसेंस की वैधता, हाईवे इंजीनियरिंग की त्रुटि आदि की पूर्ण जानकारी उक्त आईआरएडी पर देगा। रियल टाइम में विवरण दर्ज करने के साथ ही संबंधित अधिकारी अस्पताल को मोबाइल एप से एलर्ट भी भेजेगा। आईआरएडी से रिसर्च संस्थानों को जोड़ा जाएगा जो कि सडक़ हादसों का अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार करेंगे। इस कार्य में परिवहन विशेषज्ञों को आगामी 5 साल तक सहयोग करेंगे। इसमें पुलिस, परिवहन विभाग के अधिकारी, पीडब्ल्यूडी-एनएचएआई के इंजीनियर आदि को टे्रनिंग दी जाएगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने बढ़ते सडक़ हादसों पर चिंता जाहिर की है। बीते सप्ताह शुक्रवार को दिल्ली में हुए एक कार्यक्रम में संगठन के अधिकारियों ने 2020 तक सडक़ हादसों में मौत को 50 फीसदी तक कम करने का लक्ष्य पर चर्चा की।

भारत में सडक़ हादसों की वजह से साल 2017 में 1.47 लाख लोगों ने जान गंवाई। इस हिसाब से हर रोज 400 और हर घंटे 17 लोग सडक़ दुर्घटनाओं में मारे गए। सडक़ हादसों की बड़ी वजहों में मोबाइल फोन पर बातें करते हुए गाड़ी चलाना शामिल हो चुका है। उल्लेखनीय है कि रोज 5 लोग इसकी वजह से जान गंवा रहे हैं। सडक़ सुरक्षा पर काम करने वाले संगठनों ने राज्यसभा में लटके मोटर वाहन संशोधन एक्ट 2017 को शीतकालीन सत्र में अभी तक सूचित न करने पर चिंता जाहिर की है। मोटर वाहन संशोधन विधेयक में शराब पीकर गाड़ी चलाने पर 10 हजार रुपए तक जुर्माना और हिट एंड रन मामले में दो लाख रुपए तक जुर्माना हो सकता है।

निर्धारित सीमा से ज्यादा स्पीड से गाड़ी चलाने पर एक हजार से 4 हजार रुपए तक का जुर्माना की सजा का प्रावधान है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2016 में खड्डों की वजह से हर रोज औसतन 17 सडक़ हादसे हुए और औसतन सात जाने गई। वहीं स्पीड ब्रेकर की वजह से 9 हजार 583 सडक़ हादसे हुए और 3 हजार 396 जाने गई। देश में सडक़ हादसों जान गंवाने वाले दोपहिया वाहन चालकों की संख्या सबसे अधिक है। कुल हादसों का ये 33.8 फीसदी है। इनमें हर रोज औसतन 28 ऐसे लोग जान गंवाते है जिन्होंने हेलमेट नहीं पहना होता। मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर लोग धड़ल्ले से गाड़ी चलाते हैं। फोन पर बात करते हुए गाड़ी चलाने से औसतन 14 हादसे हुए जिनमें औसतन 5 लोगों की जान जाती है।

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