संयोग-वियोग का पर्याय है संसार

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अजमेर। मुनि पुंगव श्री सुधा सागर महाराज जी ने कहा कि संसार उसी का नाम है जहां संयोग वियोग हो, सुख दुख-धूप-छाव है। मोह का नाम भी संसार है, अनादिकाल से प्राणी मोह रूपी मदिरा को पीकर अपने स्वरूप को न समझते हुए, पर को अपना मानता है। पर को अपना मानना ही दु:ख का कारण है। पर को पर स्व को स्व जानना सुख का कारण है। मुनिरी ने उक्त विचार मंगलवार को महाअतिशयकारी ज्ञानोदय तीर्थ क्षेत्र नारेली में धर्मसभा में व्यक्त किए।

मुनिश्री ने कहा कि साधु संतों के अंदर केशलोंच करते वक्त आनंद आता है इसलिए साधु संत प्राय: अकेले ही इस क्रिया को कर लेते हैं। जैसे किसान घास-फूस को उखाडक़र फेंक देता है वैसे ही साधु संत अहिंसा धर्म की रक्षा तथा निस्पृहवृत्ति के लिए सिर, मूंछों के बालों को उखाडक़र फेंक देते हैं। साधु संत जीवन रूपी प्रयोगशाला में अनेकों प्रयोग करते हैं और उन प्रयोगों के द्वारा नित नया-नया आनंद का अनुभव करते हैं। इसी क्रम में मंगलवार को मुनिश्री ने अपना केशलोच किया। मुनिश्री ने कहा कि शरीर अलग है, आत्मा अलग है इसका अनुभव केशलोच के समय होता है।

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साधु की चर्या पराधीन नहीं होती साधु की चर्या निस्पृहवृति होती है। भोगों में अनंत समय व्यतीत हुआ अब विषयों भोग से उपर उठकर एक बार दिगम्बरचर्या का आनन्द लो, तो निश्चित मनुष्य योनी पाने की सार्थकता होगी। प्रचार-प्रसार संयोजक विनीत कुमार जैन ने बताया कि बुधवार प्रात: 7 बजे विघ्नहर श्री मुनि सुव्रतनाथ भगवान के अभिषेक एवं शांतिधारा होगी। इसके बाद प्रात: 8:30 बजे मुनिश्री के प्रवचन, 10:30 बजे मुनिश्री की आहारचर्या, 12 बजे सामायिक व सायं 5:30 बजे महाआरती एवं जिज्ञासा समाधान का कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।

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