राजस्थान विश्वविद्यालय: शिक्षा, शिक्षण और शोध पर उठते सवाल

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किसी भी विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा का पैमाना वहां शिक्षा, शिक्षण और शोध की स्थिति हो सकती है। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि प्रदेश के सबसे बड़े उच्च शिक्षा संस्थान राजस्थान विश्वविद्यालय के हालात दयनीय हो चुके है। एक वक्त था जब इस विश्वविद्यालय की ख्याति देश ही नहीं विदेशों में भी थी। यहां जो प्रोफेसर पढ़ाते थे उनकी ख्याति दुनिया भर में थी और कई प्रोफेसर ने यहां से आगे बढक़र न केवल विश्वविद्यालय अनुदान आयोग में बल्कि देश में उच्च शिक्षा के स्तर को ऊंचा उठाने में भी महत्वपूर्ण योगदान किया। यहां उच्च शिक्षा का अध्ययन कर विद्यार्थियों ने राज्य सरकार ही नहीं केंद्र सरकार में भी महत्वपूर्ण पदों पर रह कर देश की सेवा की है। लेकिन ये सब बातें अतीत की है, वर्तमान में हालात बहुत खराब है।

इसका प्रमुख कारण ये है कि विश्वविद्यालय में शिक्षकों और गैर शैक्षणिक कर्मचारियों की भारी कमी है। शिक्षकों में बड़ी संख्या में शिक्षक अस्थायी है और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ओर से निर्धारित मानदंडों को पूरा नहीं करते। अशैक्षणिक कर्मचारियों में काफी कम संख्या में कर्मचारी स्थायी पदों पर नियुक्त है और ज्यादातर शिक्षक संविदा पर काम कर रहै है। संविदा पर काम करने वाले कर्मचारियों को करीब पांच हजार रुपए मासिक पर काम करना पड़ रहा है। अल्प वेतन पर लगे कर्मचारियों में शैक्षणिक योग्यता पर भी समझौता किया जा रहा है क्योंकि ये नियुक्तियां प्लेसमेंट एजेंसी के जरिए की जा रही है। ऐसी हालात में विश्वविद्यालय की परीक्षाओं, विद्यार्थियों के प्रवेश और उनकी परीक्षा के बाद डिग्रियां तैयार करने के काम में स्तरहीनता के दर्शन होते रहते हैं।

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कक्षाएं न होना, परिसर में हड़ताल और प्रदर्शन तो आम बात है लेकिन पर्याप्त शिक्षक न होने से कोर्स बंद हो जाना इस बात की ओर इंगित करता है कि विश्वविद्यालय की स्थिति को संभालने में गंभीरता का अभाव है। अब ये संकेत मिले है कि राजस्थान विश्वविद्यालय में चल रहे तीन अकेडमिक केंद्रों को बंद किया जा सकता है। ये अकादमिक केद्र हैं जैन स्टडीज केंद्र, गांधीवादी अध्ययन केंद्र और महिला अध्ययन का केंद्र इसकी मुख्य वजह है कि इन अकादमिक केंद्रों में विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं हैं। शिक्षकों के अभाव ने इन केंद्रों में छात्रों की संख्या कम कर दी है। सेंटर फॉर जैन स्टडीज़ ने एक बार जैन ग्रंथों-दर्शन, धर्म, इतिहास और संस्कृति पर प्रमुख शोध केंद्र की स्थिति प्राप्त की थी। लेकिन इस केंद्र में 2017-18 अकादमिक सत्र में नामांकित एक भी छात्र नहीं रहा। सात साल पहले सेवानिवृत्त अंतिम स्थायी संकाय के बाद, विश्वविद्यालय ने इस विभाग में संकाय की भर्ती शुरू नहीं की है। सेंटर फॉर जैन स्टडीज़ में एक समय शोध के लिए छात्रों की लाईन लगा करती थी। शिक्षकों की अनुपस्थिति के कारण यह वीरान सा पड़ा हुआ है।

केंद्र में एमफिल पाठ्यक्रम कुछ साल पहले तक अतिथि संकाय की मदद से शुरु किया गया था। हालांकि, यूजीसी के एक विनियम में कहा गया है कि एमफिल के लिए एक स्थायी संकाय की आवश्यकता है, उसके नहीं होने से छात्रों की संख्या धीरे-धीरे घटती गई। इसी तरह 1986 में खुले गांधी अध्ययन केंद्र की स्थिति भी अब बंद होने की हो गई है। इस केंद्र ने हर साल अंतराष्ट्रीय स्तर के सेमिनार गांधी विचारों पर आयोजित किए है जिसमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर के विद्वानों ने हिस्सा लिया था। कई विदेशी प्रोफेसरों ने भी इनमें गांधी पर अपने विचार व्यक्त किए थे जिसके कारण विश्व भर में इस गांधी अध्ययन केंद्र की ख्याति हो गई थी। लेकिन अब इसे संभालने को प्रोफेसर ही नहीं है।

कक्षाएं नहीं लगने के कारण यह केंद्र बंद होने की स्थिति में पहुंच गया है। तीसरा केंद्र है महिला अध्ययन केंद्र। इस केंद्र में एम फिल का पाठयक्रम रोजगारोन्मुख बनाया गया था। यहां शोघ छात्रों की भी अच्छी खासी तादाद रही है। लेकिन अब स्थाई संकाय शिक्षक नहीं होने से यह केंद्र भी छात्रों से लगभग खाली हो गया है। विश्वविद्यालय में शैक्षणिक स्टाफ की कमी का ये छोटा सा परिणाम है। स्थिति इससे भी अधिक भयावह है।

राजस्थान विश्वविद्यालय के विधि संकाय में पांच साल का एलएलबी का जो कोर्स चलाया गया था वह भी अब रोकना पड़ा है। इस साल इस कोर्स तथा एम.एड. में प्रवेश नहीं दिया जा रहा। ऐसा इसलिए करना पड़ा क्योंकि बार कौंसिल ऑफ इंडिया की गाइड लाईन्स के अनुसार संकाय में प्राध्यापक नहीं थे। अब कहा जा रहा है कि बार कौंसिल ऑफ इंडिया की गाइड लाइन्स के अनुसार राज्य सरकार से प्राघ्यापक लिए जाएंगे और इस प्रकार यह सत्र भी चलेगा। कुछ भी हो, लेकिन अनिश्चय के हालात तो पैदा हो ही गए है। इसका कारण ये है कि विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों में प्राध्यापकों की जबर्दस्त कमी है जिसके कारण शोध और अन्य बातों को तो जाने दीजिए, कक्षाएं भी सही ढंग से नहीं चल पा रही। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने वर्ष 2021 से सभी विश्वविद्यालयों में प्राध्यापन के लिए पी.एच.डी अनिवार्य करने का निर्णय लिया है।

आयोग ने तो ये फैसला इसलिए किया ताकि देश में शिक्षा के गिरते मानकों से निपटा जा सके लेकिन राजस्थान विश्वविद्यालय के लिए आयोग का ये फैसला भी भारी पड़ने वाला है। वजह ये है कि वर्तमान में राजस्थान विश्वविद्यालय में जितने सहायक प्रोफेसर नियुक्त है उनमें से आधे से अधिक सहायक प्रोफेसर ने पीएचडी नहीं की है। विश्वविद्यालय में वर्तमान में करीब 242 सहायक प्रोफेसर है, उनमें से 125 सहायक प्रोफेसर ऐसे है जिन्होंने पीएचडी नहीं कर रखी है। अब अगर विश्वविद्यालय में रहना है तो उन्हें 2021 तक पीएचडी करनी होगी। सबसे ज्यादा चिंता की बात तो यह है विश्वविद्यालय में खाली पदों को भरने के काम को भी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।

करीब पांच साल पहले वर्ष 2013 में विश्वविद्यालय मे सहायक प्रोफेसरों के 239 पदों की भर्ती के लिए अभियान चलाया गया था उस समय जो भर्तियां की गई थी उसमें से केवल 60 के पास ही पीएचडी की डिग्री थी। अभी भी करीब 80 ऐसे सहायक प्रोफेसर है जो अभी पीएचडी करने में लगे है। जो बुरा हाल शिक्षकों की संख्या में राजस्थान विश्वविद्यालय का है वैसा ही गैर शैक्षणिक कर्मचारियों में भी है। करीब तीन दशक बाद अब विश्वविद्यालय में अशैक्षणिक कर्मचारियों की भर्ती का काम शुरु किया गया है। लेकिन वह भी आधा अधूरा। विश्वविद्यालय में करीब 870 पद रिक्त है लेकिन पिछले साल केवल 169 पदों की भर्ती के लिए ही विज्ञापन दिया गया था।

इससे पहले वर्ष 1984 में ही अशैक्षणिक कर्मचारियों की भर्ती की गई थी। तब से विश्वविद्यालय अस्थायी श्रमिकों की मदद से काम कर रहा है। विश्वविद्यालय में लगभग 1000 अस्थायी कर्मचारी 5000 रुपये के न्यूनतम वेतन पर काम कर रहे हैं – एक महीने में 7000 रुपये और कई लोग 10 से अधिक वर्षों से काम कर रहे हैं। अब उनकी इतनी उम्र हो गई है कि वे अन्यत्र नौकरी के लिए कोशिश भी नहीं कर सकते। वर्ष 2016 में एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कि ठेकेदार/अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी श्रमिकों के बराबर वेतन और लाभ दिया जाना चाहिए। हालांकि, विश्वविद्यालय में इसका पालन नहीं किया जा रहा है। कर्मचारी चाहते है कि उन्हें यहीं स्थायी किया जाए ताकि वेतन तो उन्हें सही मिले। वर्तमान में करीब 463 पद ऐसे है जो स्वीकृत है पर रिक्त है।

मतलब ये कि चाहे शिक्षा का मामला हो या शिक्षण का या विश्वविद्यालय के प्रशासन का, सभी क्षेत्रों में गंभीरता से कदम उठाए जाने की आवश्यकता है अगर समय रहते यह नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब राजस्थान विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा प्रदेश के अन्य विश्वविद्यालयों से भी नीचे गिर जाएगी। एक वक्त था जब राजस्थान विश्वविद्यालय से उच्चशिक्षा ग्रहण कर कोई प्रदेश के बाहर जाता था तो उसकी सेवाएं सहर्ष ली जाती थी लेकिन आज वह बात नहीं। क्या विश्वविद्यालय से जुड़े छात्र, शिक्षक और सरकार इस हालात को बदलने के लिए प्रयास करेंगे?

(ये खबर सिंडिकेट फीड से सीधे ऑटो-पब्लिश की गई है.प्रेस24 न्यूज़ ने इस खबर में कोई बदलाव नहीं किया है.आधिक जानकारी के लिए सोर्से लिंक पर जाए।)

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