बिना पेट वाली लड़की, जो दूसरों के लिए खाना बनाती है

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सिन्धुवासिनी
प्रेस24 संवाददाता

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NATASHA DIDDIEE/VARUN KHANNA

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नताशा दिद्दी

एक लड़की जिसका अपना पेट नहीं है, वो दिल लगाकर खाना बनाती है. अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए.इनकी इंस्टाग्राम फ़ीड देखेंगे तो खाने के अलावा और कुछ दिखाई ही नहीं देगा. खाना भी ऐसा कि देखते ही जी ललचा जाए. खाने की इतनी शौक़ीन लड़की ख़ुद जो चाहे वो नहीं खा सकती. उनके एक-एक निवाले पर डॉक्टर की नज़र रहती है. इन सबके बाद भी वो दिन-रात खाना बनाती हैं और बड़े प्यार से सबको खिलाती हैं.वो कई नामी रेस्तरां के लिए बतौर कंसल्टेंट काम करती हैं और खाने की ख़ुशबुओं के बीच अपनी ज़िंदगी गुज़ारती हैं.ये लड़की हैं नताशा दिद्दी जो पुणे में रहती हैं. नताशा ख़ुद को ‘द गटलेस फ़ूडी’ कहती हैं. यानी खाने-पीने का शौकीन ऐसा शख़्स जिसका पेट नहीं है.पेट निकाले जाने की कहानीबात साल 2010 की है जब नताशा ने अपने बाएं कंधे में एक चुभता हुआ सा दर्द महसूस किया. जैसे ही वो कुछ खातीं, दर्द और बढ़ जाता. चूंकि दर्द कंधे में था, वो आर्थोपेडिशियन (हड्डी के डॉक्टर) के पास गईं.

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The Gutless Foodie/ Instagram

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नताशा के बनाए खानों की एक झलक

एक्स-रे और दूसरे कई टेस्ट के बाद उनके कंधे की दो बार सर्जरी हुई और उन्हें छह महीने कड़ा वर्कआउट करने को कहा गया. बावजूद इसके, नताशा की हालत में रत्ती भर भी सुधार नहीं हुआ.ये भी पढ़ें: क्या है दुनिया का सबसे सेहतमंद खानावो दर्द से तड़पतीं और पेनकिलर खाती रहतीं. उनकी हालत सुधरने के बजाय और बिगड़ती चली गई. कभी 88 किलो की रहीं नताशा का वज़न अब घटकर 38 किलो हो चुका था.न कोई दवा काम आ रही थी, न फ़िजियोथेरेपी और न अल्ट्रासाउंड और सोनोग्रैफ़ी जैसे मेडिकल टेस्ट.आख़िर मिला सही डॉक्टरतमाम मुश्किलों और हताशा के बाद आख़िरकार नताशा सही जगह और सही शख़्स के पास पहुंचीं. वो जगह थी पुणे का केईएम हॉस्पिटल और वो शख़्स थे डॉ. एसएस भालेराव. डॉ. भालेराव के नताशा से मिलने की कहानी भी दिलचस्प है.

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NATASHA DIDDEE

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खाना बनाती हुई नताशा

उन्होंने बताया,”मैं अस्पताल के बिस्तर पर अपने घुटने मोड़कर बैठी थी. क्योंकि इस तरह बैठने से दर्द ज़रा कम महसूस होता था. उसी वक़्त मेरे कमरे में एक अनजान शख़्स आया और मुझे देखने लगा. तभी मेरे पापा और उन्होंने बताया कि वो मेरे डॉक्टर हैं.”ये भी पढ़ें: ये पांच चीज़ें आपको मोटा बना सकती हैंनताशा आगे बताती हैं, “डॉ. भालेराव ने मुझे देखने के मिनट भर बाद बता दिया कि मेरे पेट में अल्सर है जिससे ख़ून रिस रहा है और यही मेरे दर्द की वजह है.”इसके बाद एक लैप्रोस्कोपी टेस्ट हुआ और अल्सर वाली बात साबित हो गई. लैप्रोस्कोपी वो टेस्ट है जिसमें फ़ाइबर और ऑप्टिक की एक नली से पेट के अंदर हो रही हलचल को देखा जाता है.दर्द कंधे में, तकलीफ़ पेट में!डॉ. भालेराव ने प्रेस24 से बताया, “नताशा के पेट में दो अल्सर थे और उनसे ब्लीडिंग शुरू हो चुकी थी. वो इतने पेनकिलर ले चुकी थी कि उसके पेट ने काम करना बंद कर दिया था. पेनकिलर्स हमारे शरीर को बहुत नुक़सान पहुंचाते हैं, ख़ासकर इंटेस्टाइंस को.”

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डॉ. एसएस भालेराव के साथ नताशा

लेकिन अगर अल्सर पेट में थे तो दर्द कंधे में क्यों हो रहा था?इसके जवाब में डॉ. भालेराव बताते हैं, “अल्सर नताशा के पेट के उस हिस्से में था जो डायफ़्राम से लगा था. डायफ़्राम और कंधे की एक नर्व जुड़ी होती है इसलिए पेट का ये दर्द कंधे तक पहुंचता था. मेडिकल साइंस की भाषा में इसे ‘रेफ़र्ड पेन’ कहते हैं.नौ घंटे तक चला ऑपरेशनचूंकि पेनकिलर्स और अल्सर ने मिलकर नताशा के पेट को तबाह कर दिया था, इसलिए सर्जरी करके उसे निकाल देना ही एकमात्र विकल्प बचा था. इस ऑपरेशन को ‘टोटल गैस्ट्रेक्टॉमी’ कहते हैं. ये भी पढ़ें: वो औरतें परिवार के साथ क्यों नहीं खातीं?नताशा ने बताया, “ये फ़ैसला आनन-फ़ानन में लिया गया था. मैं ऑपरेशन थियेटर में बेहोशी की हालत में थी जब डॉ. भालेराव ने लैप्रोस्कोपी के ज़रिए मेरे पेट की हालत देखी. उन्होंने मेरे मॉम-डैड और पति को ये बताया.”

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NATASHA DIDDEE

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अपने माता-पिता और पति के साथ नताशा

नताशा के परिवार से कहा गया था कि ये काफी बड़ा ऑपरेशन है और इस दौरान उनकी मौत भी हो सकती है. परिवार के पास भी चांस लेने के अलावा कोई चारा नहीं था. आख़िर नौ घंटे लंबे ऑपरेशन के बाद नताशा का पेट निकाल दिया गया.पेट निकाले जाने की बात सुनकर नताशा का क्या रिऐक्शन था?इसके जवाब में वो कहती हैं, “मुझे इस ऑपरेशन के तक़रीबन एक हफ़्ते बाद इसके बारे में बताया गया. मेरे घरवालों को समझ में नहीं आ रहा था कि वो मुझे ये कैसे बताएं. जिसकी ज़िंदगी ही खाने के इर्द-गिर्द घूमती हो उसे कोई ये कैसे बता सकता है कि उसका पेट ही नहीं रहा?”ये भी पढ़ें: कोलकाता में कुत्ते का मीट अफ़वाह या हक़ीक़त लेकिन पता तो चलना ही था. पता भी चला. पता यूं चला कि नताशा हॉस्पिटल के बिस्तर में बैठी कुछ खाने जा रही थीं और तभी उनकी मां ने टोक दिया.

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अपने पति के साथ नताशा

उन्होंने कहा, “रुक! तू ऐसे कुछ भी नहीं खा सकती. डॉक्टर को दिखाना होगा. अब तेरा पेट नहीं है…”पेट नहीं है!!!नताशा ने तुरंत नीचे देखा और उन्हें समझ नहीं आया कि उनकी मां क्या कह रही हैं. दरअसल जो हम छू कर महसूस करते हैं, वो पेट का बाहरी हिस्सा होता है. नताशा के शरीर का वो हिस्सा निकाला गया है जहां खाना पचता है. पेट निकाले जाने के बाद नताशा की ज़िंदगी एकदम से बदल गई. ऐसा नहीं है कि वो खाना नहीं खा सकतीं. वो खाना खाती ज़रूर हैं लेकिन आम लोगों की तरह नहीं.अब कैसे खाना खाती हैं?अब वो दिन में सात-आठ बार खाना खाती हैं. उनके लिए फ़ुल ब्रेकफ़ास्ट, लंच या डिनर जैसा कुछ नहीं है. ये भी पढ़ें: प्रेग्नेंसी में कितना और क्या खाना चाहिए?उनका खाना डायबिटीज़ के किसी मरीज़ जैसा होता है और इसकी लगातार निगरानी होती है. खाने में अधिकतर पीने की चीजें होती हैं.उनका पाचन तंत्र कैसे काम करता है?चूंकि उनका पेट निकाला चुका है इसलिए उनका शरीर खाना स्टोर नहीं कर सकता. उनका खाना सीधे छोटी आंत में जाता है. इसकी वजह से उन्हें कई दिक्कतें भी आती हैं. मसलन, वो एकसाथ भरपेट खाना नहीं खा सकतीं. चूंकि विटामिन बी इंसान के पेट में बनता है और नताशा का पेट नहीं है इसलिए उन्हें नियमित तौर पर इसके इंजेक्शन लेने पड़ते हैं.वो ज़्यादा मीठा जैसे आइसक्रीम या रस मलाई नहीं खा सकतीं क्योंकि इससे उनके बेहोश होने की आशंका है. इसे ‘डंपिंग सिन्ड्रोम’ कहते हैं.असलियत की ठोकरनताशा कहती हैं, “पहले तो मैं इस सच को कबूल ही नहीं कर पा रही थी लेकिन असलियत से कब तक दूर भागती? असलियत की ठोकर लगी तो खूब सोचा और पाया कि मेरे पास दो रास्ते हैं. या तो मैं नाउम्मीदी में डूबकर अपना शौक़ छोड़ दूं या फिर नए सिरे से जीना शुरू करूं. मैंने दूसरा रास्ता चुना.”

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NATASHA DIDDEE/VARUN KHANNA

फ़िलहाल वो अपनी फ़ूड वेबसाइट और इंस्टाग्राम चला रही हैं, कुछ होटलों में कंसल्टेंट का काम कर रही हैं. हाल ही में उन्होंने ‘Foursome’ भी लिखी है और ज़िंदगी को भरपूर जी रही हैं.नताशा को लगता है कि भारतीय व्यंजन दुनियाभर के व्यंजनों से बेहतर हैं क्योंकि इनमें बहुत विविधता है. इसके साथ ही वो ‘हेल्दी ईटिंग’ से जुड़े तमाम मिथक तोड़ने की क़ोशिश भी कर रही हैं. रोटी-सब्जी की और लौटेंवो कहती हैं, “हमें लगता है कि हेल्दी मतलब बिना तेल-घी का उबला हुआ खाना. लेकिन सच तो ये है कि हमें तेल-घी से ज़्यादा नुक़सान शुगर और कार्बोहाइड्रेट से होता है.”

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The Gutless Foodie/Instagram

नताशा ज़ोर देकर कहती हैं कि चाहे लड़का हो लड़की, खाना बनाना सबको सीखना चाहिए और अब पिज़्जा, बर्गर छोड़कर हमें वापस रोटी-सब्ज़ी का रुख करना चाहिए.ये भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद कर्नाटक में आगे क्या होगाजिन आंखों ने देखा ज़िंदगी और मौत के बीच का मंज़र (प्रेस24 हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटरपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

(ये खबर सिंडिकेट फीड से सीधे ऑटो-पब्लिश की गई है.प्रेस24 न्यूज़ ने इस खबर में कोई बदलाव नहीं किया है.आधिक जानकारी के लिए सोर्से लिंक पर जाए।)

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