नज़रिया: राहुल-कांग्रेस आरामतलबी छोड़ने को तैयार नहीं

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अनिल जैन
वरिष्ठ पत्रकार, प्रेस24 हिंदी के लिए

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आज़ादी के बाद देश पर सबसे लंबे समय तक शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी इन दिनों अपने ‘युवा अध्यक्ष’ राहुल गांधी के नेतृत्व में अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है.पिछले लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक हार का सामना करने के बाद पिछले चार साल के दौरान कांग्रेस के हाथ से एक-एक करके वे सभी राज्य भी निकल चुके हैं जहाँ उनकी सरकारें थीं.इस समय केवल तीन छोटे राज्यों में ही कांग्रेस की सरकारें हैं, जिनकी आबादी देश की कुल आबादी की महज़ ढाई फ़ीसदी है.इस दयनीय हालत में पहुँच जाने के बावजूद यह पार्टी अभी भी अपना आलस और आरामतलबी छोडने को तैयार नहीं है.’निर्गुण आत्मविश्वास’

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खोई हुई सत्ता और वैभव फिर से हासिल करने की उसकी सारी उम्मीदें मौजूदा सरकार की नाकामियों पर ही टिकी हैं.उसे लगता है कि जब भी चुनाव होंगे तो मौजूदा सरकार से मोहभंग की शिकार जनता उसे यानी कांग्रेस को फिर से सत्ता में ले आएगी. उसकी यही अकर्मण्यता और निर्गुण आत्मविश्वास उसे एक सक्रिय और प्रभावी विपक्षी दल की भूमिका निभाने से रोके हुए है.कोई व्यापक जनांदोलन नहींकांग्रेस को सत्ता से बाहर हुए चार साल पूरे हो चुके हैं लेकिन इन चार चर्षों के दौरान किसी भी मुद्दे पर वह न तो संसद में और न ही सड़क पर प्रभावी विपक्ष के रूप में अपनी छाप छोड़ पाई है.नोटबंदी और जीएसटी से उपजी दुश्वारियां हो या पेट्रोल-डीजल के दामों में रिकार्ड-तोड़ बढ़ोतरी से लोगों में मचा हाहाकार, बेरोजगारी तथा खेती-किसानी का संकट हो या जातीय और सांप्रदायिक टकराव की बढती घटनाएं या फिर किसी राज्य में जनादेश के अपहरण का मामला, याद नहीं आता कि ऐसे किसी भी मुद्दे पर कांग्रेस ने कोई व्यापक जनांदोलन की पहल की हो.

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कांग्रेस के नेताओं और प्रवक्ताओं की सारी सक्रियता और सिर्फ़ टीवी कैमरों के सामने या ट्विटर पर ही दिखाई देती है. ताजा मामला कर्नाटक विधानसभा चुनाव से निकले जनादेश से खिलवाड़ का है.कांग्रेस के लिए यह एक ऐसा अवसर है जब वह देश भर में अपने खस्ताहाल संगठन को हरकत में लाकर सरकार के लिए सिरदर्द पैदा कर सकती है, लेकिन उसने सडकों पर उतरकर जनता के बीच जाने के बजाए अदालत का सहारा लिया.कोई भी निर्वाचित सरकार जब मनमानी पर उतर आए तो उसकी किसी भी अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक कारगुजारी के खिलाफ लोकतंत्र की वास्तविक लड़ाई अदालतों में नहीं, सडकों पर यानी जनता के बीच लड़ी जाती है क्योंकि मामला संविधान का नहीं, सियासत का है.संघर्ष का माद्दाकर्नाटक के राज्यपाल वजूभाई वाला के फैसले के खिलाफ कांग्रेस की याचिका पर अदालत ने जो रुख अपनाया वह अपेक्षित ही था. शायद ही उससे किसी को हैरानी हुई हो.कांग्रेस नेतृत्व और उसके जनाधारविहीन सलाहकारों में जरा भी आत्मविश्वास और संघर्ष का माद्दा होता तो वे कर्नाटक के राज्यपाल के फैसले के ख़िलाफ़ आधी रात को सुप्रीम कोर्ट जाने के बजाय अपने कार्यकर्ताओं के साथ सड़कों पर उतर जाते. देश भर में धरना, प्रदर्शन और पुतला दहन के कार्यक्रम करते.

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ऐसा करने पर ज्यादा से ज्यादा क्या होता, भाजपा शासित राज्यों में पुलिस उन पर लाठियां बरसाती, गिरफ्तार करती और जेल में डाल देती. संघर्ष की राजनीति में यही सबकुछ तो होता ही है.इसी से स्थानीय स्तर पर नए और सक्षम नेता उभरते हैं और इसी से सरकारें भी झुकती हैं. कांग्रेस भी इस कवायद से न सिर्फ अपने बेजान पड़े पार्टी संगठन में जान फूंक सकती थी, बल्कि जनता की सहानुभूति भी अर्जित कर सकती थी और सरकार पर दबाव भी बना सकती थी.कांग्रेसी याद करेंकांग्रेसी अगस्त, 1984 के उस वाकये को याद कर लेते जब आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री एनटी रामाराव को उनकी विदेश यात्रा के दौरान ही वहां के तत्कालीन राज्यपाल ठाकुर रामलाल ने मनमाने तरीके से बर्खास्त कर उनकी सरकार के एक असंतुष्ट मंत्री एन. भास्कर राव को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी.उस समय राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे. राज्यपाल रामलाल ने एक निर्वाचित सरकार को बिना किसी जायज वजह के बर्खास्त करने का कुकर्म केंद्र सरकार को गुमराह करके या फिर उसके इशारे पर किया था.पद से हटाए गए रामाराव स्वदेश लौटने पर अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जाने के बजाय सीधे जनता की अदालत में गए. सभी विपक्षी दल उनके साथ थे.

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देश भर में रामाराव की बर्खास्तगी के खिलाफ उग्र प्रदर्शन हुए. राजीव गांधी और रामलाल के पुतले फूंके गए. आंध्र प्रदेश में तो हालात इतने बेकाबू हो गए कि पूरी सरकारी मशीनरी पंगु हो गई.आखिरकार राजीव गांधी को न चाहते हुए भी राज्यपाल रामलाल को हटाना पडा. उनकी जगह डॉ. शंकरदयाल शर्मा को राज्यपाल नियुक्त किया गया और रामाराव फिर से मुख्यमंत्री बनाए गए.इस पूरे घटनाक्रम ने रामाराव को एक क्षेत्रीय नेता से राष्ट्रीय स्तर का नेता बना दिया.सबसे बडी पार्टी होने का तर्कइसी तरह का एक वाकया हरियाणा का भी है. वहां 1982 के विधानसभा चुनाव में चौधरी देवीलाल की अगुवाई में लोकदल और भाजपा गठबंधन को 90 सदस्यीय विधानसभा में 42 सीटें हासिल हुईं थीं (लोकदल को 38 और भाजपा को चार). दो वामपंथी तथा पांच में से तीन निर्दलीय विधायकों ने भी देवीलाल को अपना समर्थन देने का ऐलान कर दिया था.

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कांग्रेस को 41 सीटें मिली थीं और दो निर्दलीय उसके साथ थे. देवीलाल ने अपने 47 विधायकों के समर्थन के पत्र राज्यपाल को सौंप दिए थे और राजभवन में उन विधायकों की परेड भी करा दी थी.इसके बावजूद तत्कालीन राज्यपाल जीडी तपासे ने कांग्रेस के सबसे बडी पार्टी होने का तर्क देते हुए देवीलाल के दावे को खारिज कर कांग्रेस के भजनलाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी.नाराज़ देवीलालइस फैसले से नाराज़ देवीलाल राजभवन पहुंच गए थे, जहां कहासुनी के दौरान देवीलाल ने राज्यपाल तपासे का कॉलर पकड लिया था और उनके कुछ समर्थकों ने राज्यपाल के मुंह पर कालिख पोत दी थी.देवीलाल जनाधार वाले नेता थे. वे राज्यपाल के फैसले के खिलाफ अदालत में जाने के बजाय जनता के बीच गए.पूरे पांच साल उन्होंने कांग्रेस की सरकार के खिलाफ इतना व्यापक अभियान चलाया कि 1987 के चुनाव में उनके नेतृत्व में विपक्ष के गठबंधन को 90 में से 85 सीटों पर ऐतिहासिक जीत हासिल हुई.इंदिरा गांदी का उदाहरण

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गैर-कांग्रेस दलों से जुड़े इन दो बड़े उदाहरणों को छोड भी दें तो कांग्रेस के रणनीतिकार अपनी दिवंगत नेता पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का उदाहरण याद कर सकते थे.1977 में जनता पार्टी की लहर में इंदिरा गांधी खुद भी चुनाव हार गई थीं.1978 में वे कर्नाटक के चिकमंगलूर से उपचुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंचीं, लेकिन जनता पार्टी में कुछ नेताओं की जिद के कारण उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लोकसभा में पारित कराके उन्हें लोकसभा की सदस्यता से निष्कासित कर दिया गया.इंदिरा गांधी चाहतीं तो इस फैसले को अदालत में चुनौती दे सकती थीं, लेकिन उन्होंने अदालत में जाने के बजाय जनता के बीच जाना पसंद किया. देश भर में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने इंदिरा गांधी को लोकसभा से निकाले जाने के खिलाफ धरना, प्रदर्शन और पुतला दहन के कार्यक्रम किए.खुद श्रीमती गांधी ने भी अपने खिलाफ जनता पार्टी सरकार की इस कार्रवाई को मुद्दा बनाते हुए देशव्यापी दौरा किया. इसका परिणाम यह हुआ कि चंद महीनों बाद ही जब जनता पार्टी की सरकार का अपने ही अंतर्विरोधों के चलते पतन हो गया और 1980 में जब चुनाव हुए तो इंदिरा गांधी भारी बहुमत के साथ सत्ता में लौट आईं.असंवैधानिक फैसलों के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाना एक विकल्प तो हो सकता है लेकिन एकमात्र विकल्प नहीं. सबसे प्रभावी विकल्प तो जनसंघर्ष और जनता की अदालत ही है.(प्रेस24 हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

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