वीटो आलोकतांत्रिक, इसे हटाना जरूरी, हिन्दी को मिले यूएनओ में आधिकारिक दर्जा,

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भ्रष्टाचार रोकने में योगी असफल -दीपक मिश्र

गोरखपुर, 16 मई, 2018

प्रख्यात समाजवादी चिन्तक, समाजवादी बौद्धिक सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष व इण्टरनेशनल सोशलिस्ट काउन्सिल के सचिव दीपक मिश्र ने गोरखपुर प्रेस क्लब में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में ”वीटो” को लोकतंत्र व भारत विरोधी बताते हुए तत्काल खत्म करने की माँग की है। भारत का सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता और हिन्दी का संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के दर्जा से वंचित होना व रहना दुर्भाग्यपूर्ण है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी ने गत चार वर्षों में वीटो हटाने, भारत व हिन्दी को वैश्विक अधिकार दिलाने के लिए चार कदम चलना तो दूर, इतने संवेदनशील राष्ट्रीय सवाल पर चार शब्द बोला तक नहीं। चीन बार-बार ‘वीटो’ का प्रयोग भारत को अपमानित करने व भारत के शत्रु आतंकी अजहर मसूद को बचाने के लिए करता रहा है। भारत सरकार सलीके से एक प्रभावी आपत्ति तक दर्ज नहीं करा सकी।

भारतीय सरकार वैश्विक मोर्चे पर पूर्णतया विफल रही है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश भारत इस समय सुरक्षा परिषद का सदस्य नहीं है। विडम्बना यह है कि ऐसे गम्भीर व देश हित से जुड़े विषयों पर चर्चा नहीं होती। मैंने ‘वीटो’ के विरोध तथा भारत व हिन्दी के पक्ष में लगभग 36 देशों की यायावरी की है और प्राप्त समर्थन से आह्लादित हूॅं। समय आ गया है कि संयुक्त राष्ट्र संघ साधारण सभा की धारा-51 एवं सुरक्षा परिषद कार्यवाही अधिनियम की धारा-41 संशोधन कर हिन्दी को यथोचित स्थान दिया जाय। मोदी सरकार का रवैया हिन्दी के प्रति नकारात्मक है। वैश्विक सांस्कृतिक उपनिवेशवाद से हिन्दी को बचाने के लिए मोदी ने कुछ भी नहीं किया।

वर्तमान केन्द्र सरकार की आर्थिक नीति पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार जैसी ही कार्पोरेट जगत के आगे घुटनाटेकू है, जिसकी कीमत पूरा देश चुका रहा है। इस वर्ष विदेशी व्यापार में भारत को 156.83 अरब डालर का घाटा हुआ है जो गत वर्ष से 48.33 डालर अधिक है। हमारे पास कुल विदेशी मुद्रा 424.36 अरब डालर है जबकि कर्ज 1918.83 अरब डालर से भी अधिक है। प्रति व्यक्ति कर्ज 9.2 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। भारत घाटा और कर्ज में डूबा जा रहा है और हमारे राजनेताओं को तनिक चिंता नहीं है। इससे अधिक विसंगति क्या हो सकती है कि अरबपतियों के मामले में भारत, अमरीका और चीन के बाद तीसरे स्थान पर है और कुपोषित बच्चों व भिखारियों की सबसे बड़ी आबादी भी यहीं रहती है।

भ्रष्टाचार व जातिवाद से देश को निजात दिलाने के लिए सघन बहस व व्यापक अभियान की जरूरत है। इसके लिए बुद्धिजीवियों और युवाओं को आगे आना होगा। राजनीतिक दल, सत्ता के लिए जातीय गिरोह बनते जा रहे हैं। उधर राजभर पार्टी, इधर निषाद पार्टी और बीच में शिया पार्टी। गॉंधी, लोहिया व दीनदयाल को आदर्श बताने वाली जमात भी जाति-जाति खेलने लगी है।

यह वर्ष (2017-18) लोहिया व पण्डित दीनदयाल के महाप्रयाण की अर्द्धसदी है। दोनों राजनीति के सन्त हैं। दोनों को इस वर्ष सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत-रत्न’ सम्मान मिलना चाहिए। समाजवादी बौद्धिक सभा में दोनों विभूतियों के लिए भारत-रत्न की मांग कर दी है। प्रधानमंत्री के पास हमारा आग्रह पत्र पहुंच चुका है।

योगी आदित्यनाथ निःसन्देह व्यक्तिगत रूप से इमानदार हो सकते हैं किन्तु बतौर मुख्यमंत्री वे भ्रष्टाचार को रोकने में असफल सिद्ध हुए। रौतेला प्रकरण से उनकी छवि काफी धूमिल हुई है। वे गत एक वर्ष में भ्रष्टाचार पर एक भी बड़ी व कड़ी कार्यवाही नहीं कर सके। उन्होने कई बार ऐसे बयान दिये जिससे न केवल उनकी जगहंसाई हुई अपितु उनकी अज्ञानता भी जगजाहिर हो गयी। भारत रत्न गोविन्द बल्लभ पन्त, आचार्य सम्पूर्णानन्द की कुर्सी पर बैठने वाले व्यक्ति को इतने हल्के एवं सतही बयान नहीं देना चाहिए।

समाजवाद और हिटलर पर दिया गया उनका बयान उनके अल्पज्ञान को दर्शाता है। मेरी निजी सलाह है कि पढ-लिखकर बोला करें। देश हमारे मुख्यमंत्री की खिल्ली उड़ाये, अच्छा नहीं लगता। उन्होंने जो समाजवाद पर बयान दिया था वह हास्यास्पद है। समाजवाद जीवन्त जीवन-दर्शन है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद है जिसकी शपथ लेकर वे मुख्यमंत्री बने। वे जिस दल के प्रतिनिधि रहे हैं उसी भारतीय जनता पार्टी के द्वारा अंगीकृत संविधान की धारा-2 के पैरा 3 में संविधान व समाजवाद मे ंनिष्ठा रखने का संकल्प लिया गया। स्वामी विवेकानन्द ने स्वयं को समाजवादी कहते हुए ‘जाति, संस्कृति व समाजवाद’ पुस्तक लिखी है। योगी जी, चन्द्रशेखर आजाद को आदर्श बताते हैं और भूल जाते हैं कि आजाद ने समाजवाद की स्थापना के लिए हिन्दुस्तान समाजवादी गणतान्त्रिक सेना का गठन किया था। और तो और यदि योगी जी दीनदयाल जी को भी पढ़े होते तो समाजवाद पर ऐसी बात न बोलते। पंडितजी की पुस्तक ‘राष्ट्र-चिंतन’ में समाजवाद की मूल अवधारणाओं यथा-लोकतन्त्र, सामाजिक और आर्थिक विकेन्द्रीकरण को लक्ष्य घोषित किया गया है।

योगी जी अभी तक महिला आयोग समेत दर्जनों आयोगों का गठन नहीं कर सके। लगता है यह सरकार उन्होंने नौकरशाही के हवाले कर दिया है। इससे सभी दुःखी हैं और सबसे ज्यादा दुःखी भाजपा के ही कार्यकर्ता हैं। गोरखपुर लोकसभा की करारी हार इसी क्रोध और दुःख का परिणाम है।

(ये खबर सिंडिकेट फीड से सीधे ऑटो-पब्लिश की गई है.प्रेस24 न्यूज़ ने इस खबर में कोई बदलाव नहीं किया है.आधिक जानकारी के लिए सोर्से लिंक पर जाए।)

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