कश्मीर का शोपियां क्यों बन रहा है चरमपंथियों का गढ़?

0
Want create site? Find Free WordPress Themes and plugins.

माजिद जहांगीर
शोपियां से, प्रेस24 हिंदी के लिए

Loading…

इमेज कॉपीरइट
Getty Images

शोपियां – भारत प्रशासित कश्मीर का एक ऐसा ज़िला है, जो चरमपंथ के बढ़ते प्रभाव की वजह से सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है. अगर शोपियां की ख़ूबसूरती देखें, तो आपके मन में ये सवाल ज़रूर पैदा होगा कि आख़िर शोपियां क्यों चरमपंथ का गढ़ बनता जा रहा है.पीर-पंजाल की बर्फ़ से ढँकी पहाड़ियों के तले बसे शोपियां को कभी शीन-ए-वन यानी बर्फ़ का जंगल कहा जाता था. यही नहीं शोपियां को अपने सेब के बागानों के लिए भी जाना जाता है.

इमेज कॉपीरइट
Getty Images

शोपियां ज़िले की आधिकारिक वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक़, चार पुलिस थानों वाले 613 वर्ग किलोमीटर के इस ज़िले की जनसंख्या मात्र 2.66 लाख है और लगभग 95 फ़ीसदी लोग गांवों में रहते हैं. शोपियां में सेबों के बाग़ इतने घने हैं कि मुश्किल से किसी व्यक्ति को इन बागों में तलाश किया जा सकता है. ये भी एक कारण है कि यहां चरमपंथी पनाह लेने को तरजीह देते हैं. सूनी सड़कें और खाली छज्जेशोपियां में दूर-दूर तक जाने वाली सड़कों पर चलकर एक लंबी ख़ामोशी तो नज़र आती है, लेकिन इस ख़ामोशी के पीछे यहां एक ऐसा माहौल है, जिसने यहां के आम लोगों में दहशत पैदा कर दी है.

इमेज कॉपीरइट
Getty Images

बीते एक साल में सुरक्षाबलों और चरमपंथियों के बीच दक्षिणी कश्मीर में सब से ज़्यादा मुठभेड़ें हुई हैं और दर्जनों चरमपंथी मारे जा चुके हैं.इतना ही नहीं शोपियां में चरमपंथी धड़ों में शामिल होने वालों में यहां के स्थानीय युवा भी शामिल हैं. पुलिस आंकड़ों के मुताबिक़ बीते एक वर्ष में शोपियां में 58 नौजवान चरमपंथी समूहों में शामिल हो चुके हैं, जिनमें से 20 से ज़्यादा मारे जा चुके हैं.

इमेज कॉपीरइट
Getty Images

शोपियां के पडगाम पोरा गांव में सिर्फ़ अप्रैल के महीने में तीन चरमपंथी मारे जा चुके हैं. 17 अप्रैल को इसी गांव का एक और युवा आबिद नज़ीर चोपान चरमपंथी समूह में शामिल हो गया. एनडीए में शामिल युवा बना चरमपंथीपरिवार वालों के मुताबिक़, आबिद ने वर्ष 2012 में भारतीय सेना की नेशनल डिफ़ेंस अकादमी (एनडीए) में शामिल हुआ था. वो भारत के पंजाब राज्य में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था. आबिद के पिता नज़ीर अहमद चोपान कहते हैं, “आबिद छुट्टी पर आया हुआ था और जिस दिन सोशल मीडिया पर उसकी हथियार लहराते तस्वीर दिखाई गई, वह लम्हा तो मेरे लिए मौत जैसा था. ऐसा हुआ जैसे मैं मर गया. घर से बहुत ही सामान्य तरीक़े से खाना खाकर निकल गया और फिर वह वापस नहीं लौटा.”

इमेज कॉपीरइट
Majid Jahangir

Image caption

आबिद नज़ीर

जब आबिद नज़ीर के पिता से ये पूछा गया कि शोपियां के युवा आए दिन चरमपंथी समूहों में शामिल क्यों हो रहे हैं तो वह बोले, “मैं इस पर क्या कह सकता हूँ. मैं तो एक छोटा इंसान हूं. ये तो बड़े लोग बता सकते हैं कि ये नौजवान क्यों बंदूक उठाने पर मजबूर हो रहे हैं? ये बात तो आपको उन लोगों से पूछनी चाहिए जो सियासत चलाते हैं. बड़े-बड़े अधिकारी हैं उनको भी मालूम हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है. आप उनसे पूछिए कि पढ़े-लिखे नौजवान क्यों हथियार उठा रहे हैं, मेरा तो जिगर का टुकड़ा चला गया, मैं तो यही रोना रो रहा हूँ कि वह क्यों चला गया? एक माँ-बाप का इतना फ़र्ज़ बनता है कि अपने बच्चों को पढ़ाएं, जो फ़र्ज़ मैंने पूरा किया. अब मेरी क्या ग़लती है?”

इमेज कॉपीरइट
Majid Jahangir

Image caption

आबिद नज़ीर के पिता नज़ीर अहमद चोपान

क्या कहते हैं एक चरमपंथी के पिता?शोपियां में रहने वाले एक दूसरे पिता बशीर अहमद तुरे का बेटा बीते 1 अप्रैल को सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया. बशीर अहमद कहते हैं कि उनके बेटे को पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने बंदूक उठाने पर मजबूर किया. बशीर अहमद ने कहा, “मेरे बेटे को पुलिस ने फ़र्ज़ी मामलों में फंसाया. उस पर क़रीब नौ मामले दर्ज थे. उस पर पीएससीए लगाया गया. उस पर पुलिस ने पत्थरबाज़ी करने के इल्ज़ाम लगाए. ये सच है कि वह हुर्रियत के साथ काम करता था. फिर 2017 में वह पुलिस स्टेशन से भाग गया. वर्ष 2004 से उन्होंने उसको तंग करना शुरू किया. वह यहां होने वाले ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाता था, यही उसका क़ुसूर था.”

इमेज कॉपीरइट
Majid Jahangir

Image caption

मृत चरमपंथी ज़ुबैर तुरे के पिता बशीर अहमद

बशीर अहमद कहते हैं कि मैंने उनको कभी फिर हथियार छोड़ने के लिए नहीं कहा.ये पूछने पर कि अगर आपके दूसरे बेटे ने भी बंदूक उठाई तो आप क्या करेंगे?जम्मू-कश्मीर में सेना-पुलिस आमने-सामने?शोपियां की मस्जिद के पास धमाका, छह घायल80 साल का बुज़ुर्ग भी उठा सकता है बंदूकवह कहते हैं, “वह तो अभी पढ़ाई कर रहा है. अगर ऐसा ही ज़ुल्म हुआ तो बेटा क्या मैं 80 साल का बुज़ुर्ग भी बंदूक उठा सकता हूं. ये बात मैंने एक दिन एसपी से भी कही.” बशीर अहमद इस बात को मानते हैं कि बंदूक उठाना मसले का हल नहीं है, बल्कि मसले का हल बातचीत में है. लेकिन वह ये भी कहते हैं कि जब बातचीत ही नहीं हो तो बंदूक उठानी पड़ती है.

इमेज कॉपीरइट
Majid Jahangir

Image caption

मृत चरमपंथी ज़ुबैर तुरे

आबिद और ज़ुबैर के परिवारवालों का कहना है कि दोनों का झुकाव मज़हब की तरफ़ था. एक अप्रैल को शोपियां में अलग-अलग मुठभेडों में 12 चरमपंथी मारे गए थे. क्या कहते हैं शोपियां के युवा?शोपियां के एक छात्र अर्शिद उनके इलाके में चरमपंथ के बढ़ते प्रभाव पर कहते हैं, “पहले आपको ये समझना होगा कि जब नब्बे के दशक में चरमपंथ शुरू हुआ तो भारत ने उस समय ये दुष्प्रचार किया था कि जो चरमपंथी बन रहे हैं, वह पढ़े लिखे नहीं हैं और वह ग़रीब घरों के हैं. ये दुष्प्रचार अब ख़त्म हो चुका है. अगर आप देखेंगे तो अब पढ़े-लिखे लोग चरमपंथी बन रहे हैं. दरअसल हिंदुस्तान के नेताओं ने कश्मीरी जनता के साथ जो वादे किए हैं, कश्मीरी नौजवान उस वादे को पूरा होते हुए देखना चाहते हैं.” ये पूछने पर कि शोपियां में ज़्यादातर नौजवान चरमपंथी क्यों बन रहे हैं अर्शिद कहते हैं ” अगर आप देखेंगे कि ज़ुल्म कहां पर ज़्यादा हुआ है तो दक्षिणी कश्मीर आप को नज़र आएगा और शोपियां पहले नंबर पर है. एक और बात ये कि अफ़ज़ल गुरु की फांसी, बुरहान वानी का शहीद होना और राज्य सरकार की तरफ़ से सैनिक कॉलोनी का मंसूबा, पंडित कॉलोनी की बात, पाकिस्तानी शरणार्थियों को नागरिकता देना जैसे मुद्दों को लेकर नौजवानों के अंदर लावा धधक रहा था, जो अब फट रहा है.” अर्शिद बताते हैं, “ज़ुल्म की हद ये है कि यहां सेना, पुलिस या कोई भी सुरक्षा एजेंसी आप को गाड़ी से नीचे उतारकर ऐसे-ऐसे सवाल पूछेंगे कि आप अपने आपको बेइज्जत महसूस करते हैं. क्या ये ज़ुल्म नहीं है कि जब 2009 में आसिया और नीलोफ़र का बलात्कार और हत्या की गई तो किसी को भी उसकी सज़ा नहीं मिली. आप शाम के बाद घर में मोबाइल पर ज़ोर से बात नहीं कर सकते हैं. बाहर सेना घूमती रहती है.” छर्रे से गई आंख लेकिन हौसला नहीं हारी इंशाशोपियां मामले पर कश्मीर बंद

इमेज कॉपीरइट
Majid Jahangir

Image caption

पुलिस की हिरासत में चरमपंथी ज़ुबैर तुरे

कश्मीर ज़ोन के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस एसपी पाणि कहते हैं कि दक्षिणी कश्मीर के नौजवानों में चरमपंथी रुझान के कई सारे कारण हैं. शोपियां पर क्या कहती है कश्मीर पुलिस?उन्होंने कहा, “दक्षिणी कश्मीर अनंतनाग, कुलगाम, पुलवामा और शोपियां में चरमपंथ के बढ़ने की जो बातें हो रही हैं, उसको सही मायने में समझना पड़ेगा. जो आप आंकड़े बढ़ने की कह रहे हैं वह तो हम नहीं कह सकते हैं. अगर आप पांच या दस साल के आंकड़ें देखें तो यहां औसत चरमपंथी सक्रिय रहते हैं. ये इलाके ऐसे रहे हैं, जहां पर चरमपंथी गतिविधियां रही हैं.”आईजी पाणि का मानना है कि चरमपंथी की तरफ़ बढ़ते रुझान के कई सारे कारण हैं.वह कहते हैं, “मैं सिर्फ़ एक वजह नहीं मानता हूँ. कई सारे कारण हैं. जैसा कि एक दुष्प्रचार किया जाता है कि हथियार उठाने वाले पढ़े-लिखे होते हैं जो सही नहीं है. बहुत कम ऐसा होता है कि पढ़े-लिखे बच्चे इसमें जाते हैं. सोशल मीडिया इसमें बड़ा कारण होता है. सोशल मीडिया से चरमपंथ का महिमा मंडन किया जाता है जिससे एक माहौल पैदा होता है.” ले. फ़य्याज़ की हत्या पर चुप्पियों का मतलब?उमर फ़य्याज़: घर में आंसू, गाँव में पसरा सन्नाटा

इमेज कॉपीरइट
Getty Images

शोपियां में बढ़ते चरमपंथ पर आईजी पाणि कहते हैं, “जुलाई 2016 के बाद शोपियां में चरमपंथी समूहों में भर्ती में एक तेज़ी ज़रूर आई. और जो भर्ती हुई थी उसको काफी हद तक काबू किया गया है. दूसरी बात वह है कि पाकिस्तान सीमा पार से जो चरमपंथी भेजता है, उनकी मौजूदगी भी दक्षिणी कश्मीर में पाई गई है. ” आईजी पाणि कहते हैं कि बीते महीनों में क़रीब 11 बच्चे चरमपंथ के रास्ते से वापस आ चुके हैं. ‘सोशल मीडिया से कश्मीर में बिगड़े हालात’इस बार भी गर्मी में क्यों उबल रही है कश्मीर घाटीशोपियां में चरमपंथ की वजह क्याराजनैतिक विश्लेषक ताहिर मोहिउद्दीन शोपियां में बढ़ते चरमपंथ पर कहते हैं, “आजकल तो शोपियां ही चरमपंथ के हवाले से नज़र आ रहा है. ज्यादा नए लड़के शोपियां के ही बंदूक उठा रहे हैं. शोपियां में एक ख़ास बात ये है कि शोपियां इलाका यहाँ की कुछ धार्मिक जमातों के लिए केंद्र का दर्जा रखता है जिससे यहां एक नए सिरे से चरमपंथ शुरू हुआ है, मुझे लगता है कि उसमें धार्मिक मोटिवेशन है. दूसरा मसला ये रहा है कि भारत में बीजेपी की सरकार आने के बाद उनकी जो कश्मीर नीति रही है वह कश्मीर के सारे मसले फ़ौज के ज़रिए हल करना चाहती है. यहां की तहरीक को वह दबाना चाहते हैं. बुरहान वानी एक और वजह है. कश्मीर में जो नया चरमपंथ शुरू हुआ वह बुरहान वानी के बाद ही हुआ. ”

इमेज कॉपीरइट
Getty Images

ताहिर मोहिउद्दीन ये भी कहते हैं कश्मीर में आवाज़ बुलंद करने के सभी रास्ते बंद किए गए हैं जिसका नतीजा ये सामने आ रहा है कि चरमपंथ बढ़ रहा है. शोपियां के एक नागरिक शकील अहमद कहते हैं कि दक्षिणी कश्मीर में चरमपंथी अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हैं और यही वजह है कि चरमपंथी यहां अपनी बेस बनाते हैं. दक्षिणी कश्मीर को सत्तारूढ़ दल पीडीपी का गढ़ मना जाता था. पीडीपी ने दक्षिणी कश्मीर से ही अपनी सियासत की शुरुआत की है. दक्षिणी कश्मीर के अशांत हालात के चलते भारत समर्थक कोई भी राजनीतिक पार्टी दक्षिणी कश्मीर में खुल कर जनसभाओं का आयोजन नहीं कर पाती है. बीते दो वर्षों में दक्षिणी कश्मीर में कई बड़े चरमपंथी कमांडर मारे गए हैं. बुरहान वानी भी दक्षिणी कश्मीर का था. बीते दो महीनों में शोपियां में प्रदर्शनों और एनकाउंटर स्थलों पर कई आम नागरिक भी मारे जा चुके हैं. बुरहान की बरसी पर शांत रह पाएगी कश्मीर घाटी?फिर से 90 के दौर में लौट रहा है कश्मीर?(प्रेस24 हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

(ये खबर सिंडिकेट फीड से सीधे ऑटो-पब्लिश की गई है.प्रेस24 न्यूज़ ने इस खबर में कोई बदलाव नहीं किया है.आधिक जानकारी के लिए सोर्से लिंक पर जाए।)

सोर्से लिंक

قالب وردپرس

Did you find apk for android? You can find new Free Android Games and apps.

शयद आपको भी ये अच्छा लगे लेखक की ओर से अधिक

टिप्पणियाँ

Loading...