हमें नाज है हिन्द पर….

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मन घृणा से भर गया है। किसी देश का सभ्य समाज इतना नीच कैसे हो सकता है, समझ नहीं पा रहा हूँ। लाशों पर रोटी कैसे सेंकी जाती है, यह इसबार दिखा दिया सब ने। भारत के राजनीतिज्ञ, भारत की मीडिया, भारत के कथित साहित्यकार, इतने घिनौने स्तर तक उतर सकते हैं, यह कल्पना में भी नहीं था। हम कह रहे हैं कि उस बच्ची का जनवरी में बलात्कार हुआ था। पिछले दस दिनों से जो हो रहा है वह बलात्कार से कम है क्या?

आठ साल की उस मासूम बच्ची की कुचली हुई लाश को कौन नहीं नोच रहा?

अपने आप को सभ्य बताने वाला सुअर इसाई गिरोह इसी बहाने सनातन प्रतीकों के भौंडे अश्लील कार्टून बना कर रोटी सेंक रहा है। क्या यही है सभ्यता? कुछ दिन पहले यह खबर आई थी “चर्च का एक पादड़ी महिलाओं के कपड़ों में हाथ डाल कर चेक करता था कि कहीं उसने अंतः वस्त्र तो नहीं पहने।” तो क्या हम इतने भर से यीशु को बलात्कारी मान लें? क्या यीशु की टँगी मूर्तियों के हाथ में ईसाई औरतों के स्तन दिखाने लगें?

जो किसी धर्म को बुरा साबित करने के लिए इतनी नीचता पर उतर जाएं वे इंसान हैं या सुअर हैं?

स्वयं को बुद्धिजीवी कहने वाले लोग भी ऐसी तस्वीरों का समर्थन कर रहे हैं। मैं सोचता हूँ ये बुद्धिजीवी हैं या गली के कुत्ते हैं? देश की बहुसंख्यक जनता की आस्था पर ऐसा प्रहार करने वाला सिर्फ और सिर्फ कुत्ता हो सकता है, जो पेशाब करने से पूर्व जगह नहीं पहचानता।

दूसरी ओर मैत्रेयी पुष्पा और मंगलेश डबराल जैसे साहित्यकार हैं। मैत्रेयी की हरकतें मुझे बुरी नहीं लगतीं, क्योंकि उन्होंने स्वयं अपने व्यक्तिगत जीवन को इतना जहरीला बना लिया कि अब जब बोलेंगी तो जहर ही उगलेंगी। पर मुझे शर्म आती है मंगलेश डबराल जैसे साहित्यकारों पर, जो मोदी विरोध के नशे में फोटोशॉप की गई तस्वीरें साझा कर रहे हैं। क्या यही होती है एक साहित्यकार की ईमानदारी?

मोदी से अच्छे और बुरे असंख्य लोग आए और मर खप गए, पर यह देश है और रहेगा। मोदी भी दस पन्द्रह वर्षों में समाप्त हो जाएंगे। आज अगर स्वयं को साहित्यकार कहने वाला व्यक्ति मोदी से डाह के कारण देश के सम्मान के साथ खेले, तो क्या कहें उसे?

स्वयं को लोकतंत्र की प्रहरी बताने वाली मीडिया पहले ही दिन से उस मासूम की लाश बेंच रही है। कब मारा, कहाँ मारा, कैसे रेप किया… छी..

और इन सब के ऊपर हमारे अद्भुत राजनीतिज्ञ, नीचता की हद शायद इनसे ही शुरू होती है।

लग रहा है कि उस मासूम की पीड़ा ने इन्हें अपनी रोटी सेंकने का मौका दे दिया है। इनके अंदर पीड़ित के लिए कोई संवेदना नहीं, ये बस अपनी रोटी सेंकने वाले नीच लोग हैं। कभी कभी तो मुझे लगता है जैसे ये रोज अखबार देख कर बलात्कार की खबरें खोजते हैं, कि कब कोई ऐसा मौका मिले कि हम अपनी पर उतरें…

अभिषेक मनु सिंघवी का समर्थन करने वाले भी आज आंदोलन कर रहे हैं। अफरोज को सिलाई मशीन देने वाले अनशन पर बैठ रहे हैं। ‘बच्चों से गलतियां हो जाती हैं’ कहने वाले आंदोलन रत्त हैं। सन्नी लियोनी जैसी औरतें अपनी बेटी को गोद में छिपाने का नाटक कर रही हैं।

ये वही लोग हैं जो अफरोज का समर्थन कर रहे थे। ये वही लोग हैं जो बलात्कारियों की फाँसी का विरोध करते हैं। ये वही लोग हैं जो एक आतंकवादी के लिए आधी रात को कोर्ट खुलवाते हैं। ये वही लोग हैं जो फ़िल्म में रोल देने के लिए हीरोइनों की कास्टिंग काउच करते हैं। ये वही लोग हैं…

बलात्कार इनके लिए मुद्दा नहीं अवसर है।

मैंने अपने एक पड़ोसी साहित्यकार को पढ़ा, वे लिखते हैं ‘जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहाँ हैं?”

मैं कहता हूं मुझे नाज है हिन्द पर, और मैं भारत के हर गांव में हूँ। कठुआ के आरोपियों के गाँव के 1500 लोग उनकी जमानत के लिए मना कर देते हैं तो मुझे नाज होता है हिन्द पर। देश के सारे हिन्दू उस मासूम मुश्लिम बच्ची के लिए न्याय मांगने खड़े होते हैं तो मुझे नाज होता है हिन्द पर। हमारे सनातन प्रतीकों के अश्लील कार्टून बनाने वाली दिल्ली की उस सुअर पत्रकार को कोई हिन्दू ‘शार्ली एब्दो’ वाले पत्रकार की तरह हत्या नहीं करता तो मुझे नाज होता है हिन्द पर।

मित्र! चंद दलाल हमारे हिन्द के माथे पर कालिख नहीं पोत सकते।

और बैचारिक वेश्याओं! कल यदि अपराधी गैर हिन्दू निकल आये तो फिर फाँसी का विरोध मत करना, वरना देश की जनता अब तुम्हारे……..

क्रमशः

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज बिहार।

(ये खबर सिंडिकेट फीड से सीधे ऑटो-पब्लिश की गई है.प्रेस24 न्यूज़ ने इस खबर में कोई बदलाव नहीं किया है.आधिक जानकारी के लिए सोर्से लिंक पर जाए।)

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