जश्ने आजादी में न राष्ट्रगान बजा, न नेहरू की हैसियत पीएम की थी

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नई दिल्‍ली। भारत के इतिहास में यही पढ़ाया जाता है कि आजादी की लड़ाई में सबसे अहम योगदान महात्मा गांधी का था। लेकिन जब देश आजाद घोषित किया गया, उस समय महात्मा गांधी दिल्‍ली में नहीं थे। ना ही महात्‍मा गांधी आजादी के पहले जश्‍न में शामिल हुए। लेकिन लोग इस बात को भूल चुके हैं। इसलिए‍ि कि कुर्बानी बड़ी, याद छोटी होती है।
मेरे लिए जश्‍न में शामिल होना मुमकिन नहीं
जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल ने महात्मा गांधी को पत्र लिखकर बताया था कि 15 अगस्त, 1947 को देश का पहला स्वाधीनता दिवस मनाया जाएगा, पर गांधी उसमें शामिल होने नहीं आए।
उन्‍होंने खत के जवाब में कहा था- जब देश में हिंदू-मुस्लिम एक-दूसरे की जान ले रहे हैं। ऐसे में आजादी के जश्‍न में शामिल होना मेरे लिए मुमकिन नहीं है।
 जश्‍न के दिन नोआखली में अनशन पर गांधी
इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं जब देश पहला स्‍वतंत्रता दिवस मना रहा था तब अहिंसा के पुजारी और अजादी की लड़ाई के मुख्य नायक जश्‍न से एक रात पहले और जश्‍न के दिन क्या कर रहे थे।
महात्मा गांधी ने इस देश को आजाद करवाने के लिए लड़ी जाने वाली जिस लड़ाई का नेतृत्व किया था। उसका अंत 15 अगस्त, 1947 को हुआ। देश घोषित तौर पर उसी दिन आजाद हुआ।
आजाद मुल्क के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने लाल किले से तिरंगा फहराया। जनता सड़कों पर थी। लोग आजादी की पहली सुबह में झूम रहे थे। चारों तरफ एक खुशी का माहौल था।
लेकिन महात्मा गांधी इन सबसे दूर कलकत्ता में थे और आजादी के साथ हुए देश के बंटवारे और इस वजह से हो रहे हिंदू-मुस्लिम दंगों की वजह पीड़ा में थे।
हकीकत यह है कि महात्‍मा गांधी 15 अगस्‍त, 1947 को बंगाल के नोआखली में थे। वहां पर वे हिंदू-मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए अनशन कर रहे थे।
दंगे और विभाजन से व्‍यथित थे आजादी के वास्‍तुकार
हिंदू-मुस्लिम दंगों की वजह से और बंटवारे की शर्त पर मिली आजादी की वजह से व्यथित महात्मा गांधी दिल्ली में हो रहे समारोह से दूर रहे। ऐसा नहीं है कि उन्‍हें आजादी के जश्‍न में आमंत्रित नहीं किया गया। कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता उन्हें मनाने और दिल्ली लाने के लिए बंगाल गए लेकिन उन्होंने सबको लौटा दिया।
 विभाजन की बात पर नेहरू से खफा थे मोहनदास
आजादी मिलने के कुछ समय पहले उनका और नेहरू का मतभेद सामने आ चुका था। नेहरू उनकी सुन नहीं रहे थे। महान समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया की किताब भारत विभाजन के गुनहगार में इस बात का जिक्र है। पंडित जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने महात्मा गांधी को बंटवारे के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी थी।
लोहिया कांग्रेस कार्यकारिणी समिति की उस बैठक का विस्तार से जिक्र करते हैं जिसने देश की विभाजन योजना को स्वीकृति दी। लोहिया के मुताबिक इस बैठक में गांधी ने नेहरू और पटेल से शिकायती लहजे में कहा था कि उन्हें बंटवारे के बारे में सही जानकारी नहीं दी गई।
इसके जवाब में नेहरू ने महात्मा गांधी की बात को बीच में ही काटते हुए कहा था कि उन्होंने, उन्हें बराबर सूचना दी थी।

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