क्या राजद सांसद मनोज झा की शरण में हैं तेजस्वी, पटना छोड़ कर क्यों बैठे हैं दिल्ली में ?

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कौन हैं मनोज झा ? मनोज झा बिहार के सहरसा के रहने वाले हैं। वे शैक्षणिक जगत से राजनीति में आये हैं। उनके माता पिता दोनों कॉलेज में शिक्षक रहे हैं। सहरसा जिला स्कूल से मैट्रिक पास करने के बाद उन्होंने पटना के प्रतिष्ठित साइंस कॉलेज में दाखिला लिया था। फिर उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली चले गये। उन्होंने 1992 में दिल्ली विश्वविद्यालय से सोशल वर्क विषय में एमए की डिग्री हासिल की। फिर 2000 में पीएचडी किया। 1994 में वे जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में सोशल वर्क पढ़ाने के लिए लेक्चरर बहाल हुए। यह पढ़ें: Independence Day: जानिए 15 अगस्त और 26 जनवरी को झंडा फहराने में क्या है अंतर? दिल्ली विश्वविद्यालय के सोशल वर्क डिपार्टमेंट के हेड भी रहे झा 2002 में उनकी नियुक्ति दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क में हुई। वे 2014 से 2017 तक दिल्ली विश्वविद्यालय के सोशल वर्क डिपार्टमेंट के हेड भी रहे। एक शिक्षक के रूप में मनोज झा ने रिसर्च में बहुत दिलचस्पी दिखायी। उन्होंने राजनीति अर्थव्यवस्था और शासन, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक संबंध में शांति और संघर्ष की स्थिति जैसे विषयों पर गहन शोध किया। कैसे आए लालू के सम्पर्क में ? सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर पकड़ होने के कारण मनोज झा एक तार्किक वक्ता के रूप में स्थापित हो गये थे। 2015 में लालू सत्ता में वापसी के लिए जी जान से लगे हुए थे। नीतीश भी साथ लेकिन लालू राजद का कद बढ़ाना चाहते थे। राजद में कोई इंटेलेक्चुअल फेस नहीं होने से वे थोड़े चिंतित थे। इस दौर में उनकी मुलाकात मनोज झा से हुई। लालू मनोज झा की योग्यता से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने मनोज झा को प्रवक्ता बना दिया। 2015 में लालू ने संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण वाले बयान को बड़ा मुद्दा बनाया था। यह मुद्दा जीत का सबसे बड़ा आधार बना था। कहा जाता है कि लालू यादव को मनोज झा ने ही ऐसा करने की सलाह दी थी। उन्होंने कई किताबों से प्रमाणिक तथ्यों को जुटा कर लालू के लिए प्रेस नोट तैयार किया था। इसके बाद मनोज झा राजद का बौद्धिक चेहरा बन गये और हर संकट में अपने अकाट्य तर्कों का बखूबी इस्तेमाल किया। लालू ने मनोज को इसका इनाम भी दिया। मार्च 2018 में मनोज झा बिहार से राजद के टिकट पर राज्यसभा के सदस्य बनाये गये। उनकी इस तरक्की को राजद के कई नेता पचा नहीं पाये थे। शिवानंद का सवाल राजद को आगे बढ़ाने और सत्ता हासिल करने की एक बड़ी जिम्मेवारी तेजस्वी यादव के कंधों पर है। खुद लालू यादव ने यह जिम्मेवारी उन्हें सौंपी है। उनकी अपनी चाहे जो परेशानियां हों, जिम्मेदारी तो हर हाल में उठानी होगी। लेकिन तेजस्वी इस जिम्मेवारी को उठा नहीं पा रहे हैं। ऐसा राजद के वरिष्ठ नेता मानते हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी बार-बार उन्हें आईना दिखा रहे हैं। फिर भी बात बन नहीं पा रही। ‘तेजस्वी का तौर-तरीका गैरजिम्मेदाराना’ तेजस्वी का तौर-तरीका बिल्कुल गैरजिम्मेदाराना है जिससे पार्टी के विधायकों का आत्मविश्वास बिखरने लगा है। तेजस्वी का पटना से गायब रहना अब राजद के विधायकों और कार्यकर्ताओं को अखरने लगा है। वे आज आएंगे, कल आएंगे की बातों से खीझने लगे हैं। यहां पार्टी के जीवन मरण का सवाल है और कुछ लोग तेजस्वी के आने की पहेलियां बुझा रहे हैं। कार्यकर्ता पूछ रहे हैं कि क्या राजद अब ट्वीटर और फेसबुक से चलेगा या फिर कुछ संघर्ष भी करना होगा ? अगर ऐसा ही रहा तो विधानसभा चुनाव आते-आते सब कुछ खत्म हो जाएगा।

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